Wednesday , December 13 2017

कुर्बानी एक अजीम यादगार है

(निहाल हफीज)कुर्बानी हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और हजरत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की यादगार है। वाक्या इस तरह है कि हजरत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) हद बलूगत के करीब पहुंच गए तो अल्लाह तआला ने हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से आप की कुर्बानी त

(निहाल हफीज)कुर्बानी हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और हजरत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की यादगार है। वाक्या इस तरह है कि हजरत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) हद बलूगत के करीब पहुंच गए तो अल्लाह तआला ने हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से आप की कुर्बानी तलब की।

तीन दिन मुसलसल ख्वाब में कुर्बानी का सवाल होता रहा। आप राहे खुदा में सौ सौ ऊंट की कुर्बानी पेश करते रहे। तीसरी रात में सवाल हुआ तो इब्राहीम इस चीज की रजा समझ गए। आप ने सुबह अपनी बीवी हाजरा से फरमाया कि ऐे मेरी शरीक हयात सुनो! आज मैं और मेरा बेटा हम दोनों एक दावत पर जा रहे हैं। लिहाजा तुम उसे साफ सुथरा करके अच्छा लिबास पहनाकर मेरे पास ले आओ। हस्बे हुक्म मां ने बेटे को जौक व शौक के साथ आरास्ता किया और बाप के सामने पेश किया। हजरत इब्राहीम और हजरत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) मिना की तरफ रवाना हो गए। शैतान ने वरगलाना चाहा लेकिन हजरत इस्माईल साबित कदम रहे। एक पहाड़ के करीब ले जाकर हजरत इब्राहीम ने अपने बेटे से कहा- ऐ मेरे बेटे! मैंने ख्वाब में देखा है कि मैं तुझे जिबह कर रहा हूं। बता तेरी मर्जी क्या है? सआदत मंद बेटे ने जवाब दिया-आपको जो हुक्म मिला है बिलाखौफ व खतर पूरा फरमा दीजिए। मुझे आप इंशाअल्लाह सब्र करने वाला पाएंगे।

इबलीस ने फिर कोशिश की हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) से कहने लगा आप क्या गजब कर रहे हैं एक ख्वाब को हकीकत समझ कर बेटे को जिबह करने पर तैयार हो गए। आपने फरमाया ऐ मलऊन, व मरदूद! मुझ पर तेरा दाव नहीं चल सकता मेरा ख्वाब शैतानी नहीं रहमानी है। नबी का ख्वाब वाहि-ए-इलाही हुआ करता है। मैं अल्लाह तआला के हुक्म से हरगिज मुंह नहीं मोडूंगा।

शैतान ने हर तरफ से मायूस होकर सर पीट लिया। जब बाप बेटा दोनों रजा-ए-इलाही पर राजी हो गए तो बाप ने बेटे को जमीन पर पछाड़ दिया फिर बाप ने बेटे के गले पर छुरी रख दी। तस्लीम व रजा का यह मंजर आज तक चश्मे फलक ने नहीं देखा होगा। तेज छुरी हलकूम इस्माईल तक पहुंच कर कुंद हो गई। एक दो बार ऐसा हुआ। इब्राहीम ने उसे एक पत्थर पर दे मारा। पत्थर को छुरी ने दो टुकड़े कर दिए।

हजरत इब्राहीम ने छुरी से कहा तूने पत्थर जैसी सख्त चीज को काट दिया मगर इस्माईल का गला जो रेशम से भी नर्म है उसे क्यों न काटा? छुरी ने कहा खलील कहता है कि काट मगर रब्बे जलील कहता है मत काट।

बहर कैफ इसी बीच हजरत जिब्रईल अल्लाह के हुक्म से जन्नत से एक मेढ़ा जिबह लाकर हजरत इस्माईल की जगह रख देते है। बारगाहे इलाही से निदा आती है कि ऐ इब्राहीम तूने ख्वाब सच कर दिखाया। अल्लाह नेकों को यूं ही जजा देते हैं। बेशक यह साफ आजमाइश है। हम ने इसका फिदिया यह जबीहे अजीम के साथ कर दिया है और बाद वालों के लिए बाकी रखा है।

हजरत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की कुर्बानी अल्लाह तआला ने कुबूल फरमाई और उसे यादगार के तौर पर कयामत तक बाकी रखा। अब हर साल जानवर की कुर्बानी करके हजरत इस्माईल की याद ताजा की जाती है। इस्लामी साल की इब्तिदा मोहरर्मुल हराम के महीने से होती है और इंतिहा जिलहिज्जा के महीने से होती है। मोहर्रम की दसवीं तारीख को हजरत इमाम हुसैन (रजि0) की शहादत हुई और जिलहिज्जा की दसवीं तारीख को हजरत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की कुर्बानी हुई। इब्तिदा में भी कुर्बानी और इंतिहा में भी कुर्बानी।

———बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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