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कैराना पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट, जन्म दे सकती है बड़ा विवाद

लखनऊ। कैराना पलायन मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट आ गई है। इस रिपोर्ट से बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है। पहली नजर में यह किसी के प्रभाव में आ कर तैयार की गई लगती है। इसमें चंद अपराधों और लड़कियों से छेड़-छाड़ की कुछ घटनाओं का जिक्र कर कैराना में दहशत के माहौल का अहसास कराने का प्रयास किया गया है। जबकि इससे कई गुणा अधिक बदतर दशा हिंदुस्तान के कई इलाकों की है। तीन दिन पहले दिल्ली की सड़कों पर एक सिरफिरे ने एकतरफा प्यार में दिनदहाड़े चाकू से ताबड़ तोड़ 30 वार कर एक लड़की को मौत के घाट उतरा दिया था।
दूसरी तरफ, आयोग की रिपोर्ट में कैराना की छोटी छोटी वारदातों को बड़ा दिखने की कोशिश की गई है। स्थानीय सांसद हुकुम सिंह कुछ दिनों पहले एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट के आधार पर कैराना की तुलना कश्मीर से कर चुके हैं। जब उनके बयान पर बवाल मचा तो पीछे हट गए।
आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि कैराना से हिंदू परिवारों का पलायन हुआ है। 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे से विस्थापित मुसलमानों को यहां बसाने से जनसंख्या का अनुपात बदल गया है। बताते चलें कि कतिपय हिंदूवादी संगठनों ने कुछ दिनों पहले कैराना के पलायन के मुद्दे को तूल देने की कोशिश की थी।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कश्मीर जैसे हालात से कैराना की तुलना तो नहीं की है, पर अपराध के रोजमर्रा की घटना को जरूर बड़ा और नायाब बनाकर पेश किया है। रिपोर्ट पर नजर डालने पर तठस्थ लोग इसकी निष्पक्षता पर ऐतराज़ कर सकते हैं।

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रिपोर्ट का एक विवादास्पद पहलू यह भी है कि इसमे एक जगह कैराना में कुछ मुस्लिम युवक को हिंदुओं की बहू-बेटियों से छेड़छाड़ का जिम्मेदार ठहराया गया है। यानि शरारती तत्वों को सीधे मजहब से जोड़ ने की कोशिश की गई है। रिपोर्ट में आंकड़ा देते समय ईमानदारी नहीं दिखाई गई है कि हिन्दू लड़कों का मुस्लिम लड़कियों से व्यवहार कैसा है। मुस्लिम लड़कियों से छेड़ छाड़ को लेकर उनके बारे में आंकड़े क्या कहते हैं। मुजफ्फरनगर दंगे से पहले ऐसे अपराधों का आंकड़ा क्या था। बता दें कि मुजफ्फरनगर दंगे के बाद उपद्रवियों द्वारा उजाड़े जाने के बाद विस्थापित मुसलमानों को यहां बसाने और इसके चलते यहां की हिन्दू-मुसलमान जनसंख्या का संतुलन बिगड़ने के बाद से एक खास वर्ग कैराना को लगातार विवादों में घसीटरहा है। गुपचुप तरीके से कई संगठन यहां का सर्वे भी कर चुके हैं। एक विवादास्पद सर्वे रिपोर्ट बवाल भी मचा चुका है।
आयोग की रिपोर्ट में एक कश्यप परिवार की महिला के साथ गैंगरेप और फिर उसकी हत्या का जिक्र है। इस मामले में दो मुस्लिम युवक नामजद किए गए है। रिपोर्ट में जिक्र है कि ग्रामीणों के महिला के शव के साथ प्रदर्शन करने के बाद पुलिस ने कार्रवाई की। इसे सही मान भी लिया जाए, तो ऐसा लगता है कि आरोपियों की सांठगांठ कुछ पुलिस वालों से रही होगी। इस लिए रपट दर्ज करने में आना कानी की गई। मगर इस घटना को कैराना के एक वर्ग विशेष से जोड़ दिया गया। इस घटना का एक और दिलचस्पा पहलू है। स्थानीय पुलिस रेप की घटना में महिला के ही परिवार को जिम्मेदार ठहरा रही है। मगर प्रदर्शनकारी ग्रामीण बगैर जांच के मुस्लिम युवकों को दोषी ठहरा रहे हैं। उन्होंने रेप की पूरी जिम्मेदारी मुस्लिम लड़कों पर डाल दी है। आयोग की रिपोर्ट में कैराना में दो हिन्दू व्यापारियों की हत्या का मामला भी शामिल है। आयोग का माना है कि कैराना में डर और दहशत की वजह से हिंदू परिवार पलायन कर रहे हैं। आयोग ने यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता मोनिका की शिकायत पर तैयार कराई है। मोनिका एक एनजीओ चलती हैं। रिपोर्ट के लिए बनाई गई जांच कमिटी में एक डिप्टी एसपी और तीन इंस्पेक्टर शामिल किए गए थे। कमिटी ने कैराना के अलावा शामली, पानीपत, मुजफ्फरनगर और अन्य स्थानों पर इसकी जांच की। कैराना से पलायन करने वालों से फोन पर भी जानकारी ली गई। सांसद हुकुम सिंह से भी जांच टीम मिली और उनसे पलायन करने वालों की सूची ली। सूची के आधार पर कॉलोनी चिन्हित कर वहां के कुछ लोगों से बात की गई। इस मामले में आयोग ने यूपी के डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी को 8 सप्ताह में एक्शन टेकन रिपोर्ट देने के आदेश दिए हैं। रिपोर्ट का एक विवादास्पद पहलू यह भी है कि इसे तैयार करते समय वहां के सुलझे मुसलमानों के पक्ष को दरकिनार किया गया। बुद्धिजीवियों के पक्ष भी नहीं जोड़े गए। ऐसा इसलिए भी जरुरी था कि भाजपा सांसद और कुछ हिंदूवादी संगठन इसे लेकर बराबर हंगामा पैदा करते रहते हैं।

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