Tuesday , January 23 2018

क्यामत बरहक़ है

जब क्यामत बरपा हो जाएगी। नहीं होगा जब ये बरपा होगी (इसे) कोई झुठलाने वाला। किसी को पस्त करने वाली किसी को बुलंद करने वाली। जब ज़मीन थर थर काँपेगी। (सूरा अल वाक्या ।१ता४)

जब क्यामत बरपा हो जाएगी। नहीं होगा जब ये बरपा होगी (इसे) कोई झुठलाने वाला। किसी को पस्त करने वाली किसी को बुलंद करने वाली। जब ज़मीन थर थर काँपेगी। (सूरा अल वाक्या ।१ता४)

क़ुरआन-ए-करीम में क्यामत को मुख़्तलिफ़ नामों से याद किया गया है, इसी तरह इसका एक नाम अल वाक्या का भी है। क्योंकि ये ज़रूर वक़ूअ पज़ीर होगी, कोई ऐसी ताक़त नहीं जो इसे रोक सके, इसलिए उसे अल वाक्या कहा गया है।

कुफ़्फ़ार-ओ-मुशरिकीन क्यामत का इनकार करते थे और ये समझते कि मरने के बाद जी उठना नामुमकिन है। वो हरगिज़ इस बात को तस्लीम करने के लिए तैयार ना थे कि ये ज़मीन, ये फ़लक, ये चांद, ये तारे, सब कुछ दिरहम ब्रहम ( बिखर) हो जाएगा।

इसलिए क़ुरआन-ए-करीम ने हतमी अंदाज़ में ये बता दिया कि तुम लाख इनकार करो, मगर क्यामत ज़रूर बरपा होगी।

तुम सब मिल कर भी इसे रोकना चाहो तो इसे रोक नहीं सकोगे। तुम आज इनकार कर रहे हो, कल जब अपनी आँखों से मुशाहिदा कर लोगे तो तुम इसको झुठला नहीं सकोगे।

हज़रत फ़ारूक़ आज़म रज़ी० इसकी तशरीह करते हुए फ़रमाते हैं कि क्यामत अल्लाह तआला के दुश्मनों को आतिश ए जहन्नुम में सरनगु कर देगी और औलिया-ए-अल्लाह को जन्नत में सरबलंद-ओ-सरफ़राज़ करेगी।

मुफ़स्सिरीन लिखते हैं कि जिस तरह बच्चा को झूले में झुलाया जाता है, कभी ऊपर उठता है कभी नीचे झुकता है, इसी तरह ज़मीन भी इज़तरारन झूले की तरह झूलेगी, यहां तक कि इसके ऊपर जो कुछ है मकानात, दरख़्त, पहाड़, सब गिर पड़ेंगे और जड़ से उखड़ जाएंगे

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