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क्या इंटरनेट सेवा बंद करना ही एकमात्र रास्ता है..? रविश कुमार

प्रशासन और सरकारों को अब सोशल मीडिया से घबराहट होने लगी है। फिर से कश्मीर और गुजरात में कई जिलों में इंटरनेट सेवा बंद की गई है। कश्मीर के कुपवाड़ा, बारामूला, बांदीपुरा और गांदरबल में नेट सेवाएं बंद करने की ख़बर है। गुजरात में पिछले साल अगस्त के महीने की तरह इस बार भी पटेल आंदोलन को लेकर इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है। अहमदाबाद, राजकोट, वडोदरा, साबरकांठा में इंटरनेट सेवा बंद है। तब तो लोग यह भी शिकायत करते मिले कि पुलिस ने काफी मारा-पीटा है, उनके वीडियो हम शेयर न कर सकें, इसलिए इंटरनेट सेवा बंद की गई है। इंटरनेट सेवा बंद करना धड़ से धारा 144 लगा देने जैसा हो गया है। अब तो परीक्षाओं में चोरी रोकने के लिए भी उस दौरान शहर में इंटरनेट सेवा बंद कर दी जाती है। फरवरी महीने में गुजरात में ही राजस्व लेखपाल की परीक्षा के दौरान सुबह नौ बजे से एक बजे तक के लिए इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई, ताकि नकल न हो सके। ये फैसले बता रहे हैं कि इंटरनेट अब मुक्त आकाश नहीं रहा।

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The Wire नाम की न्यूज़ साइट ने लिखा है कि कश्मीर में पिछले चार साल में 18 से 25 दिनों के लिए इंटरनेट सेवा बंद की गई। पिछले साल हफिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2013 से 2015 के बीच चार राज्यों में नौ बार इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं। गुजरात, कश्मीर के अलावा नागालैंड और मणिपुर में इंटरनेट बंद हुआ है। वर्ष 2011 में Organisation for Economic Co-operation and Development (OECD) ने एक अनुमान लगाया था कि मिस्र में पांच दिन के लिए इंटरनेट बंद कर देने से नौ करोड़ डॉलर का नुकसान हो गया था। वर्ष 2015 में जर्मनी की एक संस्था ने पाकिस्तान में इंटरनेट बंद किए जाने को लेकर एक अध्ययन कर बताया था कि कैसे इससे न सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला होता है, बल्कि राष्ट्रीय या व्यक्तिगत सुरक्षा या बिजनेस को भी नुकसान पहुंच सकता है। भारत में भी टाइम्स ऑफ इंडिया से लेकर इंडियन एक्सप्रेस तक ने लिखा कि गुजरात में पटेल आंदोलन के पहले चरण के दौरान इंटरनेट बंद करने से 30 करोड़ से लेकर 7,000 करोड़ तक का नुकसान हुआ।

हम सबका जीवन अब इंटरनेट से जुड़ा हुआ है। सरकार भी अपने कई काम ऐप के जरिये करती है। ई-कॉमर्स, होटल, पर्यटन से लेकर तमाम तरह के बिजनेस इंटरनेट के जरिये ही होते हैं। आम लोग भी अब स्मार्टफोन पर उपलब्ध नेट के जरिये जीते हैं। मीडिया में रिपोर्ट कम ही होता है कि इंटरनेट बंद होने से लोगों को किस तरह से परेशानी हुई। इंटरनेट अब हवा-पानी की तरह है। क्या प्रशासन हिंसक स्थिति में पानी की सप्लाई बंद कर देता है…? अगर ऐसा है तो सरकार को बताना चाहिए कि जब किसी कारण से इंटरनेट बंद होगा, तब आप ऐप के अलावा कहां जाकर उसकी सुविधाएं ले सकते हैं।

प्रशासन को डर रहता है कि सोशल मीडिया के जरिये अफवाहें फैलने से स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। कई बार वह अपनी नाकामी के किस्से फैलने से रोकने के लिए भी बंद करती होगी। सोशल मीडिया पर रोज़ अफवाहें फैलती रहती हैं, तो क्या रोज़ ही फेसबुक और व्हॉट्सऐप बंद कर दिया जाए। सोशल मीडिया का उभार एक ऐसे स्पेस के रूप में हुआ था, जहां लोग थे। जो मीडिया और राजनीतिक दलों से अलग एक नए स्पेस की रचना कर रहे थे और अपनी बातें लिख रहे थे। अब बताने कि ज़रूरत नहीं है कि किस तरह से दलों ने इस स्पेस का इस्तेमाल राजनीतिकरण करने में किया और किस तरह से अफवाहें फैलाने का सिलसिला आज भी जारी है। इस खेल में सत्ताधारी दल से जुड़े समर्थकों और संगठनों का ही पलड़ा भारी रहता है। इनके खिलाफ शायद ही कभी कार्रवाई होती है। संगठित रूप से गाली दी जा रही है, धमकी दी जा रही है और मनमाफिक न लिखने पर राजनीतिक समर्थक व्हॉट्सऐप से लेकर फेसबुक और ट्विटर पर बदनाम करने का खेल खेलने लगते हैं।

बहुत बड़ी संख्या में लोगों को सोशल मीडिया पर लगाया गया है, ताकि वे बहसों और मुद्दों को नियंत्रित कर सकें। इनके हंगामा करने से न्यूज़ चैनलों के न्यूज़ रूम में भूचाल-सा आ जाता है। एंकर इन्हें जनता समझकर इनकी भाषा बोलने लगते हैं, और जब ये चुप हो जाते हैं, तो वह मुद्दा चैनलों से गायब हो जाता है। जैसे गुजरात में ज़मानत पर रिहा हुए अधिकारी को पुलिस प्रमुख बना दिया। इसे लेकर इन समर्थकों ने मीडिया को गाली नहीं दी कि आप चुप क्यों हैं, जबकि जिस व्यक्ति को हटाया गया है, वह खुलेआम कह रहा है कि उन्होंने पद से हटाने की गुज़ारिश नहीं की थी। उन्हें पुलिस प्रमुख के पद से नहीं हटाया जाए। डीजी वंजारा जेल से छूटकर आते हैं, और सार्वजनिक रूप से तलवार लेकर डांस करते हैं। वह खुद को देशभक्त बताते हुए दूसरे देशभक्तों का शुक्रिया अदा करते हैं। यही घटना अगर किसी दूसरे राज्य में हुई होती, तो ये लोग गालीगलौज का अंबार लगा देते कि मीडिया बिक गया है। फलानां पत्रकार चोर है, दलाल है।

सत्ताधारी दल के साथी संगठनों और समर्थकों को अफवाह फैलाने और गालीगलौज करने की छूट है। लोगों में इनकी बातों से तनाव भी फैला, मगर अब वे भी समझने लगे कि किस बात पर भरोसा करना है किस पर नहीं। लोग जानने लगे हैं कि सोशल मीडिया का किस तरह से राजनैतिक इस्तेमाल हो रहा है। अगर लोग नहीं चेते तो उनके हाथ से यह माध्यम छिन जाएगा। अभी हाल ही में आम्रपाली हाउसिंग सोसायटी को लेकर चंद लोगों ने आंदोलन किया। उन्होंने सोशल मीडिया का अच्छा इस्तेमाल कर महेंद्र सिंह धोनी से लेकर आम्रपाली ग्रुप तक पर ठीक-ठाक दबाव पैदा कर दिया, जिसकी वजह से मीडिया में भी ख़बरें चलीं, लेकिन खास विचारधारा को लेकर पत्रकारों को गाली देने वाले समर्थकों के जनसमूह ने इन नागरिकों का साथ दिया। आप पाठकों को इनकी टाइमलाइन पर जाकर चेक करना चाहिए।

आमतौर पर लोग अफवाहबाज़ों की बातों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं या ब्लॉक कर देते हैं, लेकिन जब प्रशासन ऐसा करने लगे तो इस पर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। क्या आरक्षण को लेकर हिंसक प्रदर्शन इंटरनेट से पहले के दौर में नहीं हुए…? हिंसा इंटरनेट के कारण ही भड़कती है, क्या यह हर मामले में होता है। पुलिस का काम प्रदर्शन सुनिश्चित कराना भी है, ताकि लोकतंत्र में आवाज़ उठती रहे। यह भी एक तथ्य है कि पटेल आंदोलन के दौरान हिंसा हो रही है। आंदोलन करने वालों को भी सोचना होगा कि जब तक वे अहिंसक आंदोलन सुनिश्चित नहीं करेंगे, पुलिस को ऐसा करने का मौका आसानी से मिलता रहेगा। इसके लिए पटेल नेता भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं।

कश्मीर में अफवाह ही उड़ी कि एक लड़की को कथित रूप से सेना के लोगों ने छेड़ा है। वह लड़की बार-बार कह रही है कि सेना के लोगों ने ऐसा नहीं किया है। अगर उसे पत्रकारों से मिलाया जाता, उसके वीडियो को इंटरनेट के जरिये फैलाया जाता तो क्या सही सूचना के आधार पर प्रशासन भीड़ से बेहतर मुकाबला नहीं कर पाती। वहां लड़की की मां का प्रेस कॉन्फ्रेंस रोक दिया गया, इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई। प्रशासन को सोचना चाहिए कि इंटरनेट बंद करने से पहले उसका सही इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। कोई तरीका निकालना चाहिए कि सभी इंटरनेट उपभोक्ताओं को सामूहिक रूप से सूचना भेजी जा सके। इस तरह की अफवाहें तो कई बार मुख्यधारा की मीडिया से भी फैल जाती हैं। प्रशासन ने कई जगहों पर चैनलों को भी बंद किया है।

इसी खेल को आम नागरिकों को समझना है और सतर्क रहना है। राजनीतिक समर्थकों की भाषा बोलने वालों की निष्ठा सिर्फ अपने दल के प्रति होती है। देश के प्रति होती तो वे सूखे को लेकर हंगामा कर रहे होते। लेकिन ये लोग यह अफवाह फैलाने में लगे हैं कि भारत में पहली बार पानी की रेल चली है। केंद्रीय मंत्री उमा भारती भी यह बात हमारे सहयोगी श्रीनिवास जैन के इंटरव्यू में कह रही हैं। उन तक यह बात सरकार से पहुंची या सोशल मीडिया के जरिये…? इंडियन एक्सप्रेस ने रविवार को छापा है कि 2 मई, 1986 को भारत में पहली बार गुजरात के राजकोट में पानी की रेल चली थी। मुझे किसी ने सूचना दी थी कि ’50 के दशक में इलाहाबाद से बुंदेलखंड के माणिकपुर के बीच पानी की रेल चलती थी। मैं इस सूचना की पुष्टि नहीं कर सका हूं, लेकिन सरकार के लोग इतनी आसानी से कैसे बोल दे रहे हैं कि पहली बार पानी की रेल चली है। क्या वे अपने तथ्यों की सही से जांच करते हैं।

बेहतर है कि हम समाज से ही बात करें। प्रशासन सही तथ्यों को उस तक पहुंचाए और इसके लिए ज़रूरी है कि इंटरनेट सेवा बंद न हो। कुछ साल पहले लंदन में दंगे भड़क उठे। पुलिस ने पाया कि सोशल मीडिया के जरिये कुछ बातें फैलाई गई हैं। इंटरनेट सेवा बंद करने की जगह पुलिस ने अपनी बात लोगों तक पहुंचानी शुरू कर दी। नतीजा यह हुआ कि हिंसा थम गई। इसे लेकर बाकायदा रिपोर्ट बनाई गई थी कि क्या इंटरनेट के कारण दंगे भड़कते हैं। ज़रूरत है कि हम इस अफवाह संस्कृति के राजनीतिक पक्ष को उजागर करें और सही तथ्यों से मुकाबला करें। इंटरनेट बंद करना अंतिम उपाय होना चाहिए, पहला कदम नहीं।

साभार: http://khabar.ndtv.com

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