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क्या बीजेपी की उग्र हिन्दुत्व नीति को राहुल गांधी तिलक और मंदिर जाकर दे रहे हैं जवाब?

भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक कांग्रेस की कमान अब 47 वर्षीय ‘युवा’ राहुल गांधी के पास होगी. शिवप्रसाद जोशी लिखते हैं कि उन्हें विरासत में ये जिम्मेदारी तो मिल रही है लेकिन आगे की राह आसान नहीं.

19 दिसंबर को राहुल गांधी कांग्रेस के 2014 की हार के जख्म सूखे नहीं है, कांग्रेस की चूलें हिली हुई हैं, मोदी सरकार के पहले तीन साल पूरे हो चुके हैं- ऐसे में राहुल गांधी का अध्यक्ष बनना, पार्टी में नयी जान फूंकने की- मरता क्या न करता- जैसी कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी समर्थक भले ही राहुल को खारिज करते रहे हों लेकिन गुजरात चुनाव की धुआंधारी और भीषणता में देख गया है कि राहुल गांधी 2014 के अपने राजनीतिक अपरिपक्वता के खोल को उतारकर फेंक चुके हैं और अब हेडऑन यानी आमने सामने मुकाबला करने के लिए तत्पर नजर आते हैं.

इस दृढ़ता की निरंतरता को बनाये रखना राहुल की चुनौती होगी. यानी चौबीसों घंटे उन्हें एक मजबूत विपक्षी नेता के रूप में उपस्थित रहना होगा. गुजरात के बाद जिन कुछ राज्यों में चुनाव हैं उनमें कर्नाटक और मिजोरम भी है जहां कांग्रेस की सरकार है.

राहुल को दोनों ओर वार करने होंगे. उनकी स्थिति की कल्पना एक ऐसे पैदल योद्धा के रूप में की जा सकती है जिसके पास न बहुत हथियार हैं न बहुत समय न संसाधन.

उसे अपनी राजनीतिक और सामरिक कुशलता का कड़ा इम्तहान देना होगा और अपनी दक्षता से साबित करना होगा कि वह हार को जीत में बदलने वाले चतुर राजनीतिक प्रबंधक भी हो सकते हैं.

मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना से ही राहुल गांधी या कांग्रेस का उद्धार नहीं होना है बल्कि उन्हें वैकल्पिक नीतियों का एक स्पष्ट और निर्भीक एजेंडा सामने रखना होगा जो आम जनता को मुखातिब हो. यानी सबसे बड़ी चुनौती है जनता से वापस जुड़ने की. बीजेपी की आक्रामक राजनीतिक कार्यशैली और उग्र हिंदुत्व के इस दौर में कांग्रेस ठिठकी हुई सी लगती है.

उसे नहीं सूझता कि इस उग्रता की काट के लिए वह भी नरम हिंदुत्व नीति अपनाये और तिलक जनेऊ मंदिर दर्शनों के जरिए अपनी हिंदू छाप जनमानस में अंकित करे या उस धर्मनिरपेक्षता पर ही मजबूती से टिकी रहे जो उसकी बुनियाद रही है. फिलहाल तो राहुल दो नावों पर पैर रखे हुए हैं.

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