क्या सऊदी अरब में तख्तापलट करने की चल रही है प्लानिंग?

क्या सऊदी अरब में तख्तापलट करने की चल रही है प्लानिंग?
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जैसे जैसे सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या को लेकर सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान पर दबाव बढ़ता जा रहा है, वाशिंग्टन और लंदन एक अलग योनजा बनाने में जुट गए हैं।

अमरीका और ब्रिटेन जहां अपने पुराने वफ़ादार आले सऊद परिवार को सत्ता में बनाए रखना चाहते हैं, वहीं मोहम्मद बिन सलमान की जगह युवराज के रूप में कोई नया चेहरा लाना चाहते हैं। सूत्रों के अनुसार, आले सऊद परिवार में युवराज के स्थान पर संभावित नया चेहरा लाए जाने के बारे में चर्चा भी शुरू हो गई है।

सऊदी राजशाही महल में इस तरह के तख़्तपलट की यह कोई पहली मिसाल नहीं है, बल्कि इससे पहले भी ब्रिटेन और अमरीका अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए सत्ता के मोहरे बदलते रहे हैं। 1964 में ब्रिटेन ने सऊदी राजशाही महल में एक तख़्तापलट किया था। तत्कालीन युवराज फ़ैसल ने ब्रिटेन की मदद से अपने बड़े भाई किंग सऊद को सत्ता से हटा दिया था, जो 1953 से सऊदी अरब पर शासन कर रहे थे।

1950 के दशक में आज के मोहम्मद बिन सलमान की तरह सऊदी अरब की असली बागडोर फ़ैसल के हाथ में थी और वास्तविक रूप से वही शासन कर रहे थे। लेकिन दिसम्बर 1963 में किंग सऊद ने अपने युवराज की शक्तियां छीनकर उन्हें किसी नए चेहरे से बदलने का प्रयास किया और रियाज़ में उनके महल की घेराबंदी का आदेश दे दिया।

फ़ैसल के प्रति वफ़ादार बलों और किंग के सुरक्षा बलों के बीच 1964 तक तनाव की स्थिति जारी रही। हालांकि उस समय शक्तिशाली 20 हज़ार नेश्नल गार्ड का भरपूर समर्थन फ़ैसल के साथ था। शाही परिवार की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी नेश्नल गार्ड के कांधों पर ही थी। नेश्नल गार्ड की कमान प्रिंस अब्दुल्लाह के हाथों में थी, जो बाद में किंग बने और उन्होंने 2015 तक सऊदी अरब पर राज किया।

हालांकि आज की तरह उस समय भी नेश्नल गार्ड पर असली प्रभाव ब्रिटेन का था। नेश्नल गार्ड में ब्रिटेन के दो सलाहकार टिम्बरेल और कर्नल नाइजल ब्रोमेज ने अब्दुल्लाह पर फ़ैसल की सुरक्षा के लिए दबाव बनाया। इसी के साथ ब्रिटेन ने किंग सऊद को ज़बरदस्ती गद्दी से हटाकर फ़ैसल को गद्दी पर बैठा दिया।

इस तख़्तापलट का उल्लेख करते हुए सऊदी अरब में ब्रिटेन के तत्कालीन राजदूत कोलिन क्रोव लिखते हैं, फ़ैसल को सत्ता में लाने के कुछ गंभीर दीर्घावधि परिणाम सामने आए। वहाबी मुल्लाओं का समर्थन प्राप्त करने के बदले सरकारी स्तर पर देश और दुनिया भर में वहाबी विचारधारा का प्रचार प्रसार किया गया।

क्रोव के इस बयान ने बाद में साबित किया कि आले सऊद और अब्दुल वहाब (वहाबियत) के परिवार में गठजोड़ हुआ था, जिसके बाद ही वहाबी विचारों के साथ चरमपंथ एवं आतंकवाद को दुनिया भर में बढ़ावा मिला। ख़ाशुक़जी की हत्या के बाद अब लंदन और वाशिंग्टन एक बार फिर 1964 के इतिहास को दोहराना चाहते हैं।

साभार- ‘parstoday.com’

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