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“क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की”, इक़बाल की ग़ज़ल

अल्लामा मोहम्मद 'इक़बाल'

दिल सोज़ से ख़ाली है निगाह पाक नहीं है
फिर इस में अजब क्या कि तू बे-बाक नहीं है

है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिंहाँ
ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है

वो आँख के है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन
पुर-कार ओ सुख़न-साज़ है नम-नाक नहीं है

क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की
उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है

कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मेरी ख़ाक
या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़लाक नहीं है

बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी
मेरे लिए शायाँ ख़स ओ ख़ाशाक नहीं है

आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास
मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है

(अल्लामा मोहम्मद “इक़बाल”)

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