क्या 25 साल बाद, मुलायम-कांशीराम के करिश्मे को दोहरा पाएंगे अखिलेश-मायावती?

क्या 25 साल बाद, मुलायम-कांशीराम के करिश्मे को दोहरा पाएंगे अखिलेश-मायावती?

अयोध्या आंदोलन के दौरान बीजेपी को रोकने के लिए 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने हाथ मिलाया था। इसके ठीक 25 साल बाद, एकबार फिर एसपी संरक्षक के बेटे अखिलेश यादव और बीएसपी चीफ मायावती एक साथ आए हैं।

इस बार कारण बना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और बीजेपी की 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनावों में जीत, जिसने विपक्ष को हाशिए पर धकेल दिया था। अगर 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह ही मतदान का पैटर्न बना रहा, तो एसपी-बीएसपी गठबंधन बीजेपी के सीटों को आधा कर सकती है।

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 71 और उसके सहयोगी अपना दल ने 2 सीटें जीतीं थीं। वहीं, एसपी के खाते में पांच और कांग्रेस के खाते में दो सीटें ही आई थीं, जबकि इन चुनावों में बीएसपी के हाथ खाली रहे थे। वोट प्रतिशत को देखने से पता चलता है कि 2014 में बीजेपी और अपना दल का वोट शेयर (43.63%) एसपी-बीएसपी के संयुक्त वोट शेयर (42.12%) से अधिक था। हालांकि हर सीट के सूक्ष्म विश्लेषण करने पर पता चलता है कि एसपी और बीएसपी ने मिलकर 41 सीटों पर बीजेपी से ज्यादा वोट प्राप्त किए थे। अगर आरएलडी, जो दोनों पार्टियों का एक संभावित सहयोगी है, गठबंधन में शामिल होता है तो यह आंकड़ा 42 सीटों तक पहुंच जाता है।

हालांकि, राजनीतिक जानकारों का कहना है कि चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी वोटों के गणित के आधार पर नहीं की जा सकती। परिणाम काफी हद तक उन मुद्दों पर निर्भर करता है जिन पर लोग वोट देते हैं। साल 2014 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ मजबूत ऐंटी-इंकम्बेंसी थी। लोगों ने बदलाव और एक पार्टी की स्थिर सरकार के लिए वोट किया था। वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा पीएम मोदी का प्रदर्शन होगा।

इस गठबंधन में शामिल दोनों दलों के पास जाति-आधारित वोट-बैंक हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में गठबंधन की कामयाबी दोनों पार्टियों के द्वारा अपने वोट बैंक को अपने साझेदारों को ट्रांसफर करने की क्षमता पर निर्भर करेगी। एक राजनीतिक पर्यवेक्षक, दीपक कबीर ने कहा, ‘एसपी यादवों और मुसलमानों के वोटों पर काफी हद तक निर्भर है, जबकि दलित वोटर बीएसपी का आधार हैं। दोनों दलों के एक साथ आने के बाद गठबंधन मुसलमानों की पहली पसंद बन जाएगा। लेकिन कई यादव जो एसपी के वफादार हैं, वे बीएसपी को वोट देने की बजाए बीजेपी की तरफ जाना पसंद करेंगे।’

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 1993 के विधानसभा चुनावों में जब एसपी और बीएसपी एक साथ चुनाव लड़े थे, तब दोनों ने कुछ हद तक एक-दूसरे को वोट ट्रांसफर करने में कामयाब रहे थे। उस समय राज्य में एसपी-बीएसपी गठबंधन और बीजेपी को लगभग बराबर सीटें मिली थीं और सीधा मुकाबला देखने को मिला था। तब बीजेपी को 177 सीटें और एसपी-बीएसपी को 176 सीटें मिली थीं। हालांकि, 1996 में बीएसपी-कांग्रेस और 2017 में एसपी-कांग्रेस गठबंधन मतदाताओं पर खास प्रभाव डालने में नाकाम रहे। इसके कारण ही दोनों क्षेत्रीय दल कांग्रेस के साथ गठजोड़ से बच रहे हैं।
(साभार: नवभारत टाइम्स)
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