‘खत्म हुआ आठ साल का अंधेरा’

‘खत्म हुआ आठ साल का अंधेरा’
मुंबई, 18 जुलाई: कोई बार डांसर अपना नाम सही नहीं बताना चाहती। पूछने वाला चाहे बार में आया ग्राहक हो या फिर मीडिया। पूजा (बदला हुआ नाम) भी ऐसा ही करती है।

मुंबई, 18 जुलाई: कोई बार डांसर अपना नाम सही नहीं बताना चाहती। पूछने वाला चाहे बार में आया ग्राहक हो या फिर मीडिया। पूजा (बदला हुआ नाम) भी ऐसा ही करती है।

बात शुरू करते हुए वह भले ही कहती है कि बिंदास पूछो मैं बिंदास जवाब दूंगी। लेकिन बातों का सिलसिला शुरू होते ही उसकी आंखें नम हो जाती हैं। कहती है, ‘ऐसा लग रहा है जैसे आठ साल का अंधेरा अब खत्म हुआ है।

उम्र की ढलान की ओर बढ़ चुकी पूजा 1986-87 में नागपुर से मुंबई आई थी। उसके दादा और वालिद यहां कपड़ा के मिल में काम करते थे। घर में गरीबी थी। वह भी मिल में लग गई। लेकिन जल्दी ही मिलों पर ताला लग गया और पूजा की जिंदगी ने कांटों भरा मोड़ ले लिया।

वह कहती है, ‘बाद में जहां-जहां काम मिला, वहां-वहां सेठ की नजरों से मैं समझ गई कि वह क्या चाहता है। तब मैंने खुद बार में काम करने का फैसला किया। उन दिनों बार उन लड़कियों की कमाई का अच्छा जरिया थे, जो छोटी-मोटी नौकरियां नहीं करना चाहती थीं।’

पूजा ने कहा, ‘तब बार में लड़की के लिए ग्राहक से रिश्ता बनाना जरूरी नहीं था। अपना काम करो, पैसे लो और घर चलो। ‘उसने कई बारों में काम किया। सालों तक ऐसा चला। उसकी शादी भी हुई। दो बच्चे भी। लेकिन बार डांस बंद होने के बाद पूजा के शौहर ने उसे छोड़ दिया।’

वह बताती है, ‘मुझे लड़की का नाम स्कूल से कटाना पड़ा। मेरा लड़का सातवीं में पढ़ता है। पहले वह इंग्लिश मीडियम में जाता था, लेकिन बार में डांस बंद होने के बाद उसे मराठी स्कूल में भेजना पड़ा।’

डांस बार बंद होने के बाद पूजा को अपना मकान और गहने तक बेचने पड़े। वह सुप्रीम कोर्ट के हुक्म के बाद खुश है और इंतेजार कर रही है कि रियासती हुकूमत फिर कब रेगुलेशन लाती है। डांस बारों के लाइसेंसों को तजदीद ( अपडेट) करती है।

डांस बारों की तरफ से अश्लीलता फैलाने के सवाल पर पूजा का तर्क है कि हम तो वही डांस करते हैं जो पर्दे पर हीरोइनें करती हैं। जब उनका डांस अश्लील नहीं होता तो हम पर पाबंदी क्यों? बार बंद करने वाले आरआर पाटिल के बारे में वह कहती है, ‘रात को अब उन्हें नींद नहीं आने वाली।’

मुंबई अपनी आजाद ख्याल जिंदगी के लिए यूं तो शुरू से जाना जाता रहा है, लेकिन यहां डांस बारों की बुनियाद 1970 की शुरुआत में पडऩे लगी थी। महाराष्ट्र के गरीब खेतीहर इलाकों से आने वाली लड़कियों पर बार के लीडरों की नजर पड़ी और उन्होंने अपना कारोबार बढ़ाने के लिए इन नजवान लड़कियों को अपने यहां शराब परोसने के लिए रखना शुरू किया।

इसे ‘वेटर सर्विस’ नाम दिया गया। तब ये लड़कियां बार में साड़ी पहनकर काम करती थीं और इन्हें महीने बंधी हुई त‍ंख्वाह दी जाती थी। ग्राहकों से मिलने वाली टिप्स तब इतनी नहीं होती थीं कि बार के मालिक उस पर नजर गड़ाएं या अपनी वेटरों को उसी भरोसे छोड़ दें।

ये ‘साइलेंट बार’ थे। धीरे-धीरे बार का रंग बदला और कुछ ने अपने यहां ऑर्केस्ट्रा सर्विस शुरू कर दी। जिसमें उन दिनों के मशहूर गाने गाती थी। लेकिन जब फिल्मों में आइटम नंबर जैसे गाने आने लगे तो बारों ने अपने यहां ग्लूकारों के साथ ऐसी लड़कियां भी रख लीं जो कम कपड़े पहन कर नाच सकें।

बारों ने इन लड़कियों को भी तंख्वाह पर रखा। गरीब, कम पढ़ी-लिखी लड़कियां इस तरफ तेजी से मुत्वज्जा हुईं। बार मालिकों के इस फैसले ने मुंबई के बारों की तस्वीर बदल दी और वे धीरे-धीरे अपने नाच के लिए ही मशहूर होने लगे। आखिर्कार इन्हें ‘डांस बार’ के तौर पर पहचान मिली और इनकी मकबूलियत बढ़ती चली गई।

मुंबई के बाहर भी महाराष्ट्र में ऐसे बार खुलने लगे। 1984 में महाराष्ट्र में ऐसे रजिस्टर्ड बारों की तादाद सिर्फ 24 थी, लेकिन एक दहा (दशक) में इनकी तादाद 200 के ऊपर पहुंच गई। 2005 में इनकी तादाद 1500 के करीब पहुंच गई, इनमें से अकेले मुंबई में 700 बार थे।

शगुफ्ता रफीक बॉलीवुड में ऐसा नाम है, जिसने मुंबई और दुबई के बारों से लेकर फिल्में लिखने तक का सफर तय किया है। एक वक्त उन्हें घर की हालात की वजह से बार में गीत गाने पड़ते थे। लेकिन आज वह कामयाब शख्सयित हैं।

शगुफ्ता महेश भट्ट की खास फिल्मों की सबसे अहम स्क्रिप्ट राइटर हैं। वो लम्हे (2006) से लेकर पिछले दिनों आई आशिकी-2 तक करीब एक दर्जन फिल्में लिख चुकी हैं। इन दिनों वह एक एक्शन थ्रिलर पर काम कर रही हैं, जिसका डायरेक्शन वह खुद करेंगी।

——————–बशुक्रिया: अमर उजाला

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