Wednesday , December 13 2017

ख़ुदनुमाई (देखावा)के ख़ातिर तक़ारीब, लकजरी दावतों में तब्दील

नुमाइंदा ख़ुसूसी- मुस्लमानों की तालीमी , मआशी और सेमाजी सूरत-ए-हाल का जायज़ा लें तो पता चलता है कि इन तमाम शोबों में मुस्लमान पसमांदा अक़्वाम से भी पसमांदा तरीन हैं लेकिन इस के बावजूद हमारी शादियां , वलीमा और दीगर तक़ारीब इस धूम धा

नुमाइंदा ख़ुसूसी- मुस्लमानों की तालीमी , मआशी और सेमाजी सूरत-ए-हाल का जायज़ा लें तो पता चलता है कि इन तमाम शोबों में मुस्लमान पसमांदा अक़्वाम से भी पसमांदा तरीन हैं लेकिन इस के बावजूद हमारी शादियां , वलीमा और दीगर तक़ारीब इस धूम धाम से होती हैं कि देखने वाला हैरत में रह जाता है कि ख़ुद से सवाल कर बैठता है कि तालीमी-ओ-मआशी पसमांदगी का शिकार मुस्लमान अपनी शादियों में जो ख़र्च करते हैं क्या ये उन की झूटी शान-ओ-शौकत तो नहीं ? क़ारईन ! शादी ख़ाना सजा हुआ है लोग क़िस्म किस्म के आला-ओ-कीमती मलबूसात ज़ेब तन किए हुए हैं । आगे बढ़ बढ़ कर मेहमान , नौशा को गले लगा रहे हैं । खाने के सेक्शन की तरफ़ से इशारा होता है

। मेहमान , नौशा को नज़र अंदाज करते हुए तूफ़ान की तरह खाने की मेज़ों पर टूट पड़ते हैं । जहां 4 क़िस्म मुर्ग़ , 3 किस्म के मीठे , 2 किस्म की बिरयानी , मुर्ग़-ओ-बकरे की हलीम , ज़ाइक़ादार मुर्ग , गर्म गर्म तंदूरी-ओ-रोगिणी रोटियां और सेहत को तबाह करने वाले दीगर लज़ीज़ मुर्ग़न ग़िज़ाएं मौजूद हैं । एक से बढ़ कर एक कई इक़साम के लवाज़मात (चिजों) पर मुआशरा लाखों रुपये बर्बाद कर रहा है । इन मसारिफ़ की सकत ना रखने के बावजूद सिर्फ समाज पर अपना रोब जमाने झूटी शेखी , ज़ाहिर करने और एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए इस तरह की दावतों का हतमाम किया जा रहा है ।

इस के लिए लोग सूद पर क़र्ज़ लेने से भी नहीं कतरा रहे हैं और बाअज़ वाक़ियात तो एसे भी पेश आए हैं जहां अपने लड़के या लड़कियों की बड़े पैमाने पर शादी के बाद क़र्ज़ से तंग आकर कई अफ़राद ने अपनी ज़िन्दगियों का ख़ातमा करलिया है या फिर परेशानियों में उलझ कर अपनी ज़िंदगियां बर्बाद करली हैं । हैरत की बात ये है कि हिंदूस्तान में सब से ज़्यादा पसमांदा समझे जाने वाले हम मुस्लमानों की अक्सर दावतों में 1000 से ज़ाइद मेहमान शरीक होते हैं जब कि इन की तवाज़ो के लिए फ़ी फ़र्द 250 और 350 रुपये के मसारिफ़ आते हैं अगर फ़ी आदमी खाने पर 350 रुपये अदा किए जाएं तो 1000 मेहमानों पर सिर्फ एक वक़्त के खाने के लिए 3 लाख 50 हज़ार रुपये के मसारिफ़ बर्दाश्त करने पड़ेंगे । इस के इलावा शादी ख़ाना का किराया अलग ।

स्टेज की तय्यारी के लिए 10 ता 50 हज़ार रुपये के इलावा मसारिफ़ एसी फुज़ूल खर्ची हर किसी ने देखा और महसूस क्या होगा कि खाने के टेबल पर इतनी कसीर तादाद में डिशेस रखी जा रही हैं कि मेहमान ये सोचने पर मजबूर होरहा है आख़िर खाना शुरू करे तो कहां से शुरू करे ? ।दूसरी जानिब इस मुआमला में गरीब और मुतवस्सित (मिडिल)अफ़राद मुआशरा के फ़ुज़ूल खर्च अनासिर की देखा देखी इसी तरह की शाहाना ख़र्च करते हुए तबाही को दावत दे रहे हैं । लोगों को दिखाने के लिए वलीमा की तक़रीब में ज़्यादा से ज़्यादा लवाज़मात रखने की ख़ातिर जोड़े की रक़म के नाम पर मोटी रक़म वसूल की जा रही है ।

हद तो ये है कि धूम धाम से शादियां करने वाले 90 फीसद हज़रात महर उधार रख रहे हैं । यानी महर मुअज्जल , पर ही इकतिफ़ा किया जा रहा है । एसे में हम ये कह सकते हैं कि मुस्लिम मुआशरा में मस्जिद में अक़द जोड़े की रक़म नक़द और महर उधार का रिवाज चल पड़ा है । दौलतमंद-ओ-अहल सरवत हज़रात की देखा देखी के मर्ज़ी में मुबतला हो कर शादी की तक़ारीब और वलीमा को लकजरी दावतों में तब्दील कर दिया है ख़ुद को दूसरों से मुमताज़ करने के लिए महंगे शादी ख़ाने , बहतरीन स्टेज लगा कर एक दूसरे पर सबक़त ले जा रहे हैं । एसा लगता है कि समाज का ये तबक़ा मेहमानों पर ये एहसान जताने की कोशिश करता है कि हम ने कैसे शादी की है ? क्या शान बाण दिखाया है ।

दुनिया इस शादी और वलीमा को बरसों याद रखेगी । हम ने एक नई तारीख बनाई है । क़ारईन ! आज हम ने सिर्फ और सिर्फ ज़ाती मफ़ादात के लिए ख़ुद को मुमताज़-ओ-आला साबित करने के लिए रयाकारी को अपना कर ख़ुद को दीन से दूर करलिया है । हम ये अह्द कर सकते हैं कि जो कुछ हो सो हुआ , अल्लाह अज़्ज़-ओ-जल गुनाह बख़शने वाले ग़फ़ूर उल रहीम हैं । माफ़ करने वाले हैं । आइन्दा अपनी दावतें , अपनी शादियां अपने वलीमे , इस्लामी तालीमात के मुताबिक़ करेंगे। अल्लाह की रहमतों से उम्मीद रखते हुए ये भी अह्द करें कि तमाम तक़ारीब में अब सिवाए एक डिश के कोई और डिश नहीं रखेंगे ताकि समाज में बे चैनी पैदा ना हो सके ।

किसी के दिल में छोटे और बड़े होने का एहसास जगह ना पा सके । वैसे भी कुरैशी बिरादरी ने इस सिलसिला में पहले ही क़दम उठाते हुए मिल्लत को सबक़ दिया है । कुरैशी बिरादरी ने शादियों वलीमा और दीगर तक़ारीब में सिर्फ एक ही किस्म का खाना रखने की गुंजाइश रखी है । ज़िला करनूल , महबूब नगर , शादनगर , निज़ाम आबाद में भी मुस्लमानों ने शादियों में किफ़ायत शआरी का अमल शुरू किया है ख़ुद हिंदूस्तान में Guest Control Act बनाया गया था ताहम वो सिर्फ़ जंग के ज़माने के लिए था । बहरहाल इस ज़िमन में उल्मा आइमा-ओ-ख़तीब साहिबान और मशाइख़ीन अहम रोल अदा कर सकते हैं । अमली इक़दामात करते हुए मिल्लत को अमली क़दम उठाने की दावत दे सकते हैं क्यों कि हम से दाने , दाने का हिसाब लिया जाएगा । बस अल्लाह ही हिदायत देने वाला है ।।

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