गरीबी से जमीनी जंग लड़ते अर्थशास्त्री

गरीबी से जमीनी जंग लड़ते अर्थशास्त्री

अभिजीत बनर्जी भारत की गरीबी पर शोध करने वाले ऐसे पहले अर्थशास्त्री नहीं हैं, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। इस सिलसिले में सबसे पहला और शायद सबसे बड़ा नाम गुन्नार मिर्डल का है, जिन्होंने भारत की गरीबी को पहला अर्थशास्त्रीय आधार दिया था। इसके बाद गरीबी और खासकर कुपोषण पर अमत्र्य सेन का अध्ययन है, जो आज भी बेजोड़ है। गुन्नार मिर्डल से लेकर अमत्र्य सेन तक विकासवादी अर्थशास्त्र की जो धारा चलती है, वह अभिजीत बनर्जी और उनकी जीवन संगिनी एस्टर डफ्लो तक आती है।

दोनों ही केंब्रिज के मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जुडे़ हैं। इसके साथ ही यूनिवर्सिटी के ही एक अन्य संस्थान से जुडे़ माइकल के्रमर का जिक्र भी जरूरी है। इन तीनों को ही संयुक्त रूप से 2019 का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। तीनों ही विकासवादी अर्थशास्त्री हैं। यह अर्थशास्त्र की वह धारा है, जो गरीबी को आर्थिक व्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा मानकर चुप नहीं हो जाती, बल्कि यह प्रतिबद्धता भी रखती है कि गरीबी को सरकारी प्रयासों से खत्म किया जा सकता है। गरीबी कम या खत्म करने के लिए पिछले काफी समय से देश में कई तरह की जो योजनाएं चल रही हैं, वे सब कम या ज्यादा विकासवादी अर्थशास्त्र की सोच से प्रेरित हैं। इन सभी अर्थशास्त्रियों ने गरीबी का सिर्फ अध्ययन ही नहीं किया, उससे लड़ने और खत्म करने के तरीकों पर भी काफी काम किया है।

इनके दो योगदान सबसे महत्वपूर्ण हैं। कोई भी नीति या गरीबों को लाभ देने का कोई रास्ता कितना कामयाब होगा, इसे जानने के लिए उन्होंने मेडिकल साइंस के उस औजार को उधार लिया, जिसे रेंडम कंट्रोल ट्रॉयल कहा जाता है, यानी वह तरीका है, जिससे किसी भी नई दवा या नए नुस्खे को परखा जाता है कि वह कितना कामयाब हो सकता है। इतना ही नहीं, गरीबी उन्मूलन के लिए उन्होंने जिस संस्था की नींव रखी, उसे भी प्रयोगशाला का ही नाम दिया गया- पॉवर्टी एक्शन लैब। दूसरा महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने गरीबों से दूर रहकर सिर्फ सिद्धांतों के जरिए गरीबी को समझने की कोशिश नहीं की।

पति-पत्नी, दोनों ने ही जगह-जगह पर गरीबों के साथ लंबा समय बिताया, ताकि वे उनके जीवन के दबावों और उसकी वजह से बनने वाली सोच व व्यवहार को अच्छी तरह से समझ सकें। अभिजीत बनर्जी को जो चीज बाकी अर्थशास्त्रियों से अलग करती है, वह उनके यही अनुभव हैं। जब दूसरे अर्थशास्त्री यह कहते हैं कि अगर गरीबों को सीधे धन दे दिया जाए, तो उसका अपव्यय कर देंगे, तब अभिजीत बनर्जी यह कह रहे होते हैं कि यह अपव्यय नहीं है, अतिरिक्त धन से गरीब दरअसल अपनी नीरस जिंदगी में रंग भरने की कोशिश करते हैं।

इस सोच से बहुत सारे लोग सहमत नहीं भी हो सकते। असहमति उस न्याय योजना से भी हो सकती है, जो उन्होंने कांग्रेस पार्टी को सुझाई थी। गरीबों को हर साल 72 हजार रुपये देने वाली इस योजना पर राहुल गांधी ने बड़ा चुनावी दांव खेला था। पर यह योजना भी उनका सियासी उद्धार नहीं कर सकी और उनकी पार्टी चुनाव हार गई। मगर इस चुनावी हार से परे अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार दिया जाना दरअसल अर्थशास्त्र की उस धारा की जीत है, जो यह मानती है कि गरीबी के अभिशाप को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।

साभार: लाइव हिंदुस्तान

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