Monday , December 11 2017

ग़ज़ल

यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी कितने ग़म थे कि ज़माने से छुपा रक्खे थे इस तरह से कि हमें याद न आए खुद भी ऐसा ज़ालिम कि अगर ज़िक्र में उसके कोई ज़ुल्म

यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी
वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी

कितने ग़म थे कि ज़माने से छुपा रक्खे थे
इस तरह से कि हमें याद न आए खुद भी

ऐसा ज़ालिम कि अगर ज़िक्र में उसके कोई ज़ुल्म
हमसे रह जाए तो वो याद दिलाए ख़ुद भी

लुत्फ़ तो जब है तअल्लुक़ में कि वो शहरे-जमाल
कभी खींचे कभी खिंचता चला आए ख़ुद भी

ऐसा साक़ी हो तो फिर देखिए रंगे-महफ़िल
सबको मदहोश करे होश से जाए ख़ुद भी

यार से हमको तगाफ़ुल का गिला है बेजा
बारहा महफ़िले-जानाँ से उठ आए ख़ुद भी

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