Tuesday , December 12 2017

गीताप्रेस की किताबों का प्रभाव बरक़रार

गोरखपूर: टेलीविज़न और इंटरनेट की चकाचौंद भरी दुनिया में किताबों के तईं लोगों की घटती ध्यान‌ के बावजूद नीति-अनुशासन, धार्मिक और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली गीताप्रेस की किताबों की बिक्री में ना सिर्फ इज़ाफ़ा हुआ है बल्कि दुनिया के कई देशों में इन किताबों का डंका बज रहा है।

1923 में कोलकाता से धार्मिक किताब ‘गीता की नाम से अपना सफ़र शुरू करने वाला गीताप्रेस को आज देश‌ में ही नहीं बल्कि दुनिया-भर में धार्मिक और शैक्षणिक किताबों के सबसे ज़्यादा लोकप्रिय पब्लिशर के तौर पर जाना जाता है। आज उन धार्मिक किताबों की प्रकाशित का असल केंद्र गीताप्रेस गोरखपूर है।

गीताप्रेस की किताबों की एक विशेषता इनकी कम क़ीमत है किताब की प्रकाशन के लागतों से भी कम क़ीमत कस्टमर से वसूलने वाला दुनिया में शायद ये इकलौता केंद्र है। गीताप्रेस के संस्थापक जय‌ दयाल जी गोविंदका ने हिन्दी अनुवाद के साथ इस धार्मिक किताब ‘गीता की प्रकाशित किया था जो आज 15 ज़बानों में प्रकाशित हो रही है जिसमें खासतौर पर हिन्दी और संस्कृत हैं इस के अलावा बंगला, मराठी, गुजराती, मलयालम, पंजाबी, तामिल, कंनड, आसामी, उड़िया, उर्दू, अंग्रेज़ी और नेपाली भाषा में है।

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