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गोरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी से समाज में आक्रोश, सख्त कार्रवाई करने की जरूरत

राजकोट। दलित समुदाय के वे चारों युवक जिन्हें मरे हुए जानवरों की चमड़ी उतारने का अपना पुश्तैनी काम करने पर गोरक्षा दल ने पीटा था, अपने साथ हुई वारदात को 8 दिन बाद भी नहीं भूल पा रहे हैं। रमेश सर्वैया, बाबू हीरा, अशोक बिजल और बेचर उगाभाई नाम के इन सभी पीड़ितों के लिए अपने साथ हुआ यह हादसा भूल पाना शायद कभी भी मुमकिन नहीं हो सकेगा।

उस घटना को याद करते हुए रमेश बताते हैं, ‘वे एक घंटे तक हमें लोहे की पाइप और डंडों से पीटते रहे। हमने जैसे उस वक्त अपनी मौत को ही देख लिया था। हम पूरी जिंदगी में फिर कभी यह काम नहीं करेंगे।’ रमेश ने वह खौफ याद करते हुए आगे कहा, ‘सरकार हमें मुआवजा देने का प्रस्ताव दे रही है, लेकिन अगर प्रशासन हमें उन सबको पीटने की इजाजत दे जिन्होंने हमें पीटा था, तो हम इसके बदले 1 लाख रुपये देने को तैयार हैं।

अपने साथ हुई वारदात का ब्योरा बताते हुए रमेश ने कहा, ‘हम मरे हुए जानवरों की चमड़ी लेकर जा रहे थे कि तभी 2 कारें हमारी ओर आईं। फिर एकाएक वहां 5-7 कारें और आ गईं। उनमें करीब 40 लोग थे। उन्होंने हमें रोका और बेदर्दी से हमें पीटने लगे। हमने उनसे कहा कि हमने गायों को नहीं मारा है, लेकिन वे हमारी बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। जब मेरे पिता हमें बचाने आगे आए, तो उन लोगों ने उनको भी मारा।

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