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घर की आस लिये चल बसी आबिदा

तीन साल पहले इसलाम नगर के उजड़ने से बेघर हुई 33 साला खातून आबिदा ने जुमेरात को दम तोड़ दिया। नये आशियाने की आस में हुकूमत, अफसरों और लीडरों का यकीन देहानी सुनते-सुनते उसकी मौत हो गयी। औरों की तरह उसे भी घर नसीब नहीं हुआ। किसी तरह ठंड स

तीन साल पहले इसलाम नगर के उजड़ने से बेघर हुई 33 साला खातून आबिदा ने जुमेरात को दम तोड़ दिया। नये आशियाने की आस में हुकूमत, अफसरों और लीडरों का यकीन देहानी सुनते-सुनते उसकी मौत हो गयी। औरों की तरह उसे भी घर नसीब नहीं हुआ। किसी तरह ठंड से ठिठुरते दो साल तो गुजार दी, पर तीसरे साल की ठंड ने उसकी जान ले ली। 16 जनवरी की सुबह ठंड से उसकी मौत हो गयी। टाट की झोपड़ी को छेद कर ठंड ने आबिदा को अपनी आगोश में ले लिया। दिन के दो बजे इसलाम नगर के लोगों ने आबिदा खातून को सुपुर्द-ए-खाक किया। इस मौके पर हमदर्द कमेटी के कई रुक्न मौजूद थे।

सिर्फ एक दीवारवाला घर : इसलाम नगर में टाट और बोरा से बने घर में आबिदा अपने खानदान के साथ रह रही थी। घर ऐसा है कि सिर्फ एक तरफ ही दीवार है। बाक़ी तीन तरफ बोरे टंगे हुए हैं।

सरकार मौत की जिम्मेदार : बीवी की मौत से बौखलाये शौहर मुनव्वर इस हाल के लिए हुकूमत और इंतिज़ामिया को जिम्मेवार मानते हैं। उनका कहना है कि हुकूमत हमें उजाड़ कर खुद तमाशा देख रही है। आज तक सिर्फ यकीन देहानी ही मिलती रही, लेकिन कुछ हुआ नहीं। इसलाम नगर में 250 ऐसे खानदान हैं, जो टेंट और बोरे से बने घरों में रहने को बेबस हैं।

बाशुक्रिया : प्रभात खबर

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