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चुनाव में हिंदुत्व के इस्तेमाल के अपने दो दशक पुराने फैसले पर फिर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

“ हिंदुत्व धर्म नहीं बल्कि एक जीवन शैली है “ अपने इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट दो दशक बाद एक बार फिर विचार करेगा | सात सदस्यों वाली पीठ इस इस मुद्दे और इससे जुड़े विभिन्न मामलों पर फिर से विचार करेगी |

 

कुछ दलों की इस सुनवाई में अटोर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को शामिल करने की मांग को नज़रन्दाज कर, मुख्य न्यायधीश टी एस ठाकुर की अध्यक्षता में सात सदस्यों वाली पीठ इस मामले पर सुनवाई करेगी |

 

“क्या आप कह रहे हैं कि हर मामले में जो कानून की व्याख्या करने से संबंधित हो, उसमें अटॉर्नी जनरल की सहायता की जरूरत है,” न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, एसए बोबडे, एके गोयल, यू यू ललित, डीवाई चंद्रचूड़ और एल नागेश्वर राव की सदस्यता वाली पीठ ने शीर्ष कानून अधिकारी से सहायता लेने का मुद्दा उठाने वाले वकील से पूछा।

 

अपनी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ चुनाव प्रचार में धर्म के आधार पर वोट मांगने या किसी तरह के धार्मिक फायदे पहुँचाने के वादों पर  वोट मांगने से जुड़े सवालों पर विचार करेगी |

 

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों के पीठ ने 1995 में व्यवस्था दी थी कि ‘हिंदुत्व, हिंदूवाद उपमहाद्वीप में लोगों की जीवनशैली है और यह मनोवृत्ति है’। यह फैसला मनोहर जोशी बनाम एनबी पाटील मामले में सुनाया गया जिसे न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने लिखा था जिसमें पाया गया कि जोशी का बयान कि महाराष्ट्र में पहला ‘हिंदू राज्य स्थापित होगा’, धर्म के आधार पर अपील के लायक नहीं है।

 

यह टिप्पणी जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 123 की उपधारा तीन में बताए गए भ्रष्ट क्रियाकलापों के दायरे के संबंध में सवालों से निपटते हुए की गई थी। तीस जनवरी 2014 (शुक्रवार) को इस कानून की धारा 123 की उपधारा तीन की व्याख्या का मुद्दा पांच न्यायाधीशों के पीठ के सामने आया था जिसने इसे जांच के लिए सात न्यायाधीशों के बड़े पीठ के पास भेजा। सात न्यायाधीशोें का पीठ भाजपा नेता अभिराम सिंह द्वारा 1992 में दायर अपील पर गौर करेगा जिनका बंबई हाई कोर्ट ने 1991 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए निर्वाचन निरस्त कर दिया गया था।

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