चौमहल्ला प्यालेस में उर्दू नदारद (मौजूद नहीं)

चौमहल्ला प्यालेस में उर्दू नदारद (मौजूद नहीं)

नुमाइंदा ख़ुसूसी-शहर हैदराबाद जहां उर्दू को एक नया रुख और नए पैरहन से आरास्ता किया गया जहां उर्दू पली , बढ़ी , फली फूली और अपनी इर्तिक़ाई मनाज़िल तए की । जहां इस के जांनिसार सपूत बे लौस ख़ुद्दाम और इस की तहज़ीब के पासदार-ओ-निगहबान ग

नुमाइंदा ख़ुसूसी-शहर हैदराबाद जहां उर्दू को एक नया रुख और नए पैरहन से आरास्ता किया गया जहां उर्दू पली , बढ़ी , फली फूली और अपनी इर्तिक़ाई मनाज़िल तए की । जहां इस के जांनिसार सपूत बे लौस ख़ुद्दाम और इस की तहज़ीब के पासदार-ओ-निगहबान गुज़रे हैं । एसे शहर में अगर इस ज़बान को नज़र अंदाज किया जाता है तो ये इस के साथ नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त ज़ुलम-ओ-ज़्यादती होगी । ऐसी ज़बान जिस ने इंसानियत नवाज़ मुआशरा अता किया । मुहब्बत भरी तहज़ीब दी । ज़बान-ओ-गुफ़्तगु में चाशनी-ओ-शीरीनी पैदा की । अलफ़ाज़ के ज़रीया मुहब्बत बांटने के अंदाज़ और सलीका सिखाय , इस ज़बान को पस-ए-मंज़र में डालना नाशुक्री और एहसान फ़रामोशी होगी ।

निज़ाम और आसिफ़ जाहि हुक्मराँ बल्कि क़दीम क़ुतुब शाही हुक्मराँ ने उर्दू और असातिज़ा उर्दू की सर परस्ती की । इन की उर्दू दोस्ती का इनकार तप्ती दोपहर में सूरज के इनकार से कुछ कम नहीं । इन महबान उर्दू की ज़ात और उन से मुताल्लिक़ नवादिरात के तआरुफ़ में उर्दू को नज़र अंदाज कर देना दोहरा ज़ुलमहोगा । चौमहल्ला महल को कौन नहीं जानता ये चमनिस्तान हैदराबाद बल्कि दक्कन का गुलाब है । इस के ताल्लुक़ से कई दिनों से मुसलसल मुअज़्ज़िज़ान शहर की जानिब से अख़बार सियासत को डाक मौसूल होरही है । जिन में मुतालिबा किया गया है कि चौमहल्ला महल में हुए उर्दू के साथ यतिमाना सुलूक से इंतिज़ामीया महिकमा आसार क़दीमा , हुकूमत और अवाम को सियासत अख़बार के ज़रीया बाख़बर किया जाय । डाक में शिकायत की गई है कि मुस्लिम बादशाहों के इस अज़ीम उल-शान महल में उर्दू का कहीं नाम-ओ-निशान नहीं है । जब कि ये पूरा महल फ़ारसी तर्ज़ तामीर का शाहकार है । इस में जगह जगह अरबी-ओ-फ़ारसी की इबारतें दीवारों में लिखी हुई हैं ।

बुज़ुर्गान शहर के ख़ुतूत को संजीदगी से लेते हुए हम ने चौमहल्ला महल का मुतालेआती दौरा किया । हैरत की बात है कि हम ने महल का गोशा गोशा छान मारा मगर कहीं भी उर्दू का वजूद हमें नहीं मिला । इस महल में निज़ाम और आसिफ़ जाहि दौर के बेश बहा नवादिरात , ख़ूबसूरत झाड़-ओ-फ़ानुस , आलमयारी पेंटिंग , नादिर और अनोखी गाड़ियां क्राकरी के ख़ूबसूरत बर्तन , शानदार फर्नीचर , मुख़्तलिफ़ और हथियारों का मजमूआ इन तमाम तारीख़ी नवादिरात को बहुत हिफ़ाज़त और सलीक़े से नुमाइश के लिए रखा गया है । और हर चीज़ का मुख़्तसर तआरुफ़ नाम वगैरह भी पेश किया गया है लेकिन अफ़सोस की बात है कि हर जगह और हर चीज़ पर अंग्रेज़ी ज़बान इस्तिमाल की गई है । कहीं भी उर्दू ज़बान आप को नज़र नहीं आएगी ।

हर हलक़ा में तआरुफ़ी बोर्ड भी नसब है लेकिन ये भी सिर्फ अंग्रेज़ी ज़बान में है । क़ारईन ! चौमहल्ला महलात के साथ निज़ाम बादशाहों की वाबस्तगी हर ज़माना में रही है । ये आसिफ़ जाहि हुकमरानों का तख़्त सलतनत रही है । नीज़ निज़ाम सरकारी रिहायश गाह के तौर पर उसे इस्तिमाल में लाते थे । और तमाम सरकारी तक़ारीब बशमोल निज़ाम बादशाहों के ताजपोशी और गवर्नर जनरल के इस्तिक़बालीया प्रोग्राम सब यहीं मुनाक़िद होते थे । 15 मार्च 2010 को महफ़ूज़ तहज़ीबी विरसा के लिए उसे एशिया के मुअज़्ज़िज़ यूनेस्को सलामती इमतियाज़ी इनाम ( इवार्ड ) से नवाज़ा गया । आसिफ़ुद्दौला मीर अली सलाबत जंग ( 27 नवंबर 1718 । 16 सितंबर 1763 ) ने 1750 में इस ख़ूबसूरत तरीन क़दीम और तारीख़ी महल की बुनियाद रखी और तामीर शुरू करवाई ।

जब कि इस की तकमील अफ़ज़लुद्दौला आसिफ़ जाह ख़ामिस मीर तहनियत अली ख़ां सिद्दीकी ( 11 अक्टूबर 1827 । 26 फरवरी 1869 -ए-) के अह्दे हुकूमत 1857 और 1809 के दरमियान अमल में आई । ये महल तेहरान में मौजूद शाह इरान के महल के तर्ज़ पर है । महल तर्ज़ तामीर और ख़ूबसूरती में पूरे हिंदूस्तान में अनोखी हैसियत का मालिक है । वाज़ेह रहे कि आसिफ़ जाह सानी नवाब मीर निज़ाम अली ख़ां ने 1175 ह / 1761 -ए-में हैदराबाद को अपना दार उल सलतनत बनाया और अपनी इक़ामत के लिए महल को मुंतख़ब किया और चौमहल्ला नाम रखा गया । आप ने इस में कई इमारतें तामीर कराइं । जैसे दीवान , बार आम , ख़लवत वगैरह ये चार महल थे इस लिए चौमहल्ला से मौसूम हुआ । चौमहल्ला मक्का मस्जिद से लेकर घोड़ों की चौक क़ाज़ी पूरा तक वुसअत रखता है । बाक़ौल मोलिफ़ बुस्तान आसफी : दो लाख 90 हज़ार मुरब्बा गज़ पर ये महल है ।

तीसरे , चौथे , पाँचवें बल्कि छटे और सातविं आसिफ़ जाह के ज़माने में भी इस महल में कई इमारतें तामीर हुईं । इस अहाता में शामिल इमारतें हसब ज़ैल नामों से मौसूम हैं । जिलौ ख़ाना , ख़लवत मुबारक , रंग महल , रोशन बंगला , अफ़ज़ल महल , आफ़ताब महल ,महताब महल , तहनियत महल , चांदनी बेगम की हवेली , मँझली बेगम की हवेली , बख़शी बेगम की हवेली , मोती बंगला , शादी ख़ाना , तोशा ख़ाना , पंच मुहल्ला , महल कल पैरां , राग माला , इस के इलावा भी कई इमारतें हैं । आसिफ़ जाह सानी के बाद तीसरे और चौथे आसिफ़ जाह का क़ियाम यहीं रहा । पाँचविं और छटे आसिफ़ जाह कभी यहां और कभी पुरानी हवेली में क़ियाम करते । तमाम दरबार ख़ाह आम होया ख़ास यहीं हुआ करते ।

ये महल मशरिक़ी तर्ज़ पर आरास्ता था । मग़रिबी तमद्दुन फैलने लगा तो यूरोपियन सामान आराइश फर्नीचर वगैरह से ज़ीनत दी गई । निज़ाम साबह के अह्द में ईदें और सालगिरा के दरबार और ख़ेताबात की सरफ़राज़ी वगैरह इस महल में होती थी । अंग्रेज़ी दरबार यानी रेज़ेडनटों से मुलाक़ात , ख़रीता पेश करना और गवर्नर जनरल की मुलाक़ात सब यहीं होती । शाही ज़ियाफ़त भी इस जगह होती चौमहल्ला ना सिर्फ मुतअद्दिद इमारतों के बाइस निहायत वसीअ है बल्कि इस के अहाते और सहन भी कुशादा और अरीज़ है । चौमहल्ला आसिफ़िया हुकूमत का शाही महल रहा है और तक़रीबा 100 साल तक आसिफ़ हुकमरान यहां मुक़ीम रहे उसे वाज़ेह होता है कि इस महल की शान-ओ-शौकत और आरास्तगी कैसी शानदार रही होगी ।

ये तारीख़ी , क़दीम और ख़ूबसूरत तरीन महल , कीमती एशिया-ए-, और अजीब-ओ-गरीब नवादिरात से भरा हुआ मुस्लिमा हुकमरानों की याद ताज़ा करता है लेकिन वहां जाकर दिल को जब तकलीफ पहुंचती है जब कि ये देखा जाता है कि कहीं भी उर्दू ज़बान इस्तिमाल नहीं की गई है महकमा आसार क़दीमा और हुकूमत ने जहां उन नादिर अशिया की हिफ़ाज़त-ओ-सेयानत और अवाम के लिए उन्हें देखने की सहूलत फ़राहम की है इन का ये अमल काबिल-ए-सताइश है । वहीं उन से पुर ज़ोर अपील की जाती है कि वो शहर की अवाम के इस मुतालिबा की तरफ़ संजीदगी से तवज्जा करे और जल्द अज़ जल्द उस की तलाफ़ी की जाय ।

हैरत तो ये है कि इस तारीख़ी महल का तआरुफ़ नामा भी उर्दू ज़बान में दस्तयाब नहीं है । जैसा कि किसी और जगह और चीज़ का उर्दू ज़बान में तआरुफ़ नहीं किया गया जिस के सबब सय्याहों को परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है । इस सिलसिले में हम ने ख़िलवत महल के ऑफीसर से मुलाक़ात और इस अहम भूल की तरफ़ उन की तवज्जा मबज़ूल कराई जिस का उन्हों ने भी एतराफ़ किया ।लिहाज़ा हुकूमत और महिकमा से दोबारा मुतालिबा किया जाता है कि इस जानिब इक़दाम किए जाएं और जल्द अज़ जल्द इस ख़ला को पुर क्या जाय ।।

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