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जगा बदल्ने से स्वप्नफल भी बदल जाता है

एक इलाक़े की मिट्टी दूसरी इलाक़े की मिट्टी से मुख़्तलिफ़(जूदा) होती है। हवा, पानी और मकान(जगा) के इख़तिलाफ़(बदलाव) से भी ताबीर(स्वप्न फल) बदल जाती है। तमाम मूअब्बीरिन(स्वप्नफल बताने वालें) इलाक़े और तबीअतों के मुख़्तलिफ़ हो जाने की सूरत म

एक इलाक़े की मिट्टी दूसरी इलाक़े की मिट्टी से मुख़्तलिफ़(जूदा) होती है। हवा, पानी और मकान(जगा) के इख़तिलाफ़(बदलाव) से भी ताबीर(स्वप्न फल) बदल जाती है। तमाम मूअब्बीरिन(स्वप्नफल बताने वालें) इलाक़े और तबीअतों के मुख़्तलिफ़ हो जाने की सूरत में एक ही ख़ाब की ताबीर मुख़्तलिफ़ देते हैं। मसलन एक आदमी किसी गरम इलाक़े में बर्फ़, तेज़ हवा या सख़्त सर्दी देखता है तो दलील है कि गिरानी और कहत साली की। फिर अगर यही शख़्स इसी ख़ाब को किसी ठंडे इलाक़े में देखे तो दलील है ख़ुशहाली और वुसअत माली की। इसी तरह ख़ाब में मिट्टी, कीचड़ वग़ैरा देखना अहल ए हिंद के लिए माल और ग़ैर अहल हिंद के लिए मेहनत-ओ-मुसीबत की दलील है। इसी तरह ख़ुरूज ए रिह की ताबीर अहल हिंद के लिए सुरूर-ओ-ख़ुशी और उन के ग़ैर के लिए कलाम क़बीह(बूरी बात) से की जाती है। इसी तरह मछली देखने की ताबीर बाज़ इलाक़ों में उफ़ूनत से और बाज़ इलाक़ों में एक से चार तक निकाह करने की ताबीर ली जाती है और यहूद के लिए मुसीबत मूराद ली जाति है।

कभी कभि ख़ाब की ताबीर दूसरों के लिए होती है
इंसान कभी दूसरों के लिए भी ख़ाब देखता है, जेसे अपने रिश्तेदारों, अका़रिब, भाई, वालिदा, हमशकल, हमनाम, हमपेशा, बीवी और ग़ुलाम वग़ैरा के लिए ख़ाब देखता है, यानी उस की ताबीर दूसरों के लिए दी जाती है। जैसा कि अबु जहल बिन हिशाम ने ख़ाब देखा कि गोया वो इस्लाम में दाख़िल हुआ और हुज़ूर स.व. के हाथ पर बैत की, तो ये ख़ाब इस के बेटे के लिए था, यानी इस का बेटा बाद में इस सिफ़त से मुत्तसिफ़ हुआ।

इसी तरह हज़रत उम ए फ़ज़ल (रज़ी.) ने आप स.व. की ख़िदमत में आकर अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह! मैंने एक डराउना ख़ाब देखा है तो आप स.व. ने फ़रमाया ख़ैर देखा। हज़रत उम ए फ़ज़ल कहने लगीं या रसूल अल्लाह! मेरे बदन का कुछ हिस्सा जुदा हुआ और मैंने उस को अपनी गोद में ले लिया तो आप स.व. ने तबस्सुम फ़रमाते हुए फ़रमाया हज़रत फ़ातिमा के हाँ लड़का होगा, तुम उस को अपनी गोद में लोगी। चुनांचे एसा ही हुआ, उन के चचाज़ाद भाई हज़रत अली रजी. से हज़रत फ़ातिमा (रज़ी.) के हाँ हज़रत हसन (रज़ी.) पैदा हुए और हज़रत उम ए फ़ज़ल ने इन को अपनी गोद में लिया।

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