Thursday , December 14 2017

जज़बा-ए-ख़िदमत से सरशार बालराज के ओल्ड एज होम में चांद सुलताना की देखभाल

हर इंसान किसी ना किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुज़ार लेता है । यहां तक कि बाअज़ एसे भी होते हैं जो ख़ुद को ज़िंदा रखने दूसरों को मौत के घाट उतारने से गुरेज़ नहीं करते । उन्हें बस अपने और अपनी आल-ओ-औलाद की फ़िक्र दामन गीर रहती है । इस के बरख़ि

हर इंसान किसी ना किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुज़ार लेता है । यहां तक कि बाअज़ एसे भी होते हैं जो ख़ुद को ज़िंदा रखने दूसरों को मौत के घाट उतारने से गुरेज़ नहीं करते । उन्हें बस अपने और अपनी आल-ओ-औलाद की फ़िक्र दामन गीर रहती है । इस के बरख़िलाफ़ अल्लाह के चंद बंदे एसे भी होते हैं जो अपने लिये नहीं बल्कि दूसरों के लिए जीते हैं ।

ये एसे लोग होते हैं जो किसी ज़ईफ़-ओ-माज़ूर और बीमार के कराहने की आवाज़ पर तड़प उठते हैं कोई गिरता है तो उसे थाम लेते हैं । उन लोगों का सिर्फ़ एक ही मक़सद होता है कि मख़लूक़ की ख़िदमत की जाये क्यों कि वो जानते हैं कि रब ज़ुलजलाल को इंसानों की ख़िदमत बहुत पसंद आती है ख़ासकर ज़ईफ़ों(बूढों) मरीज़ों की तीमारदारी और उन की ख़िदमत से ख़ालिक़ कायनात बहुत ख़ुश होता है ।

एसी ही शख्सियत मिस्टर बालराज की है जो तक़रीबन 6 बरसों से मानव सेव माधवा सेवा सुसाइटी के ज़रीया इंसानियत की बेलौस ख़िदमत बजा ला रहे हैं । गरीब , बेसहारा , औलाद की नाफ़रमानी का शिकार , बहू के गैर इंसानी सुलूक से मुतास्सिर , ज़िंदगी की आख़िरी सांस लेने वाले मर्द-ओ-ख़वातीन को वो अपने , ओल्ड एज होम में ना सिर्फ़ सहारा देते हैं बल्कि उन की हत्तल मक़दूर ख़िदमत-ओ-निगहदाशत करते हैं।

मानवा सेवा माधवा सेवा सुसाइटी सन सिटी हैदर शाह कोटा लंगर हौज़ के तहत चलने वाले इस बीत अलमारेन में ज़ईफ़-ओ-बीमार और बेसहारा लोगों के ईलाज-ओ-मुआलिजा के लिए हमेशा दो डॉक्टर्स और एक नर्स दस्तयाब रहते हैं जबकि मिस्टर बालराज ख़ुद बड़ी तुनदही से ज़ईफ़ मकीनों की ख़िदमत बजा लाते हैं ।

मिस्टर बालराज ने बताया कि चांद सुलताना के शौहर जो महिकमा रेलवे में मुलाज़िम थे उन का इंतिक़ाल पहले ही होचुका था । चूँकि चांद सुलताना फ़ालिज से मुतास्सिर हो कर 4 बरसों तक फ्रेश रहीं चूँकि उन की देख भाल के लिए कोई नहीं था । इस लिये चांद सुलताना के शौहर के दोस्त अली मुही उद्दीन ने उन्हें बालराज के ओल्ड एज होम में शरीक करवाया ।

उस वक़्त मुसलसल बेड पर पड़े रहने के बाइस चांद सुलताना की पीठ पर फोड़े होचुके थे और बिस्तर में ही पेशाब पाख़ाना भी करलिया करती थीं । बालराज ने मुहतरमा चांद सुलताना की ख़िदमत में कोई कोताही नहीं बरती हर रोज़ नहलाते सफ़ाई करते ।

पेमपर बदलते जब कि चांद सुलताना की बेटी और नवासा हर साल आकर उन से मुलाक़ात कर जाते । बालराज ने बताया कि चांद सुलताना को माहाना 5500 वज़ीफ़ा मिला करता था और ये वज़ीफ़ा सुसाइटी के नाम पर मुंतक़िल किया गया जिस से अदवियात पेमपरस वगैरह खरीदे जाते थे ।

उन्हों ने ये भी बताया कि मालदार लोगों के अतियात पर सुसाइटी के ओल्ड एज होम को चलाये जाता है । क़ारईन आप को बतादें कि बालराज के तीन बेटे हैं और तीनों सॉफ्टवेर इनजीनरर हैं उन की बहूएं भी इनजीनरय हैं सब ख़ुशहाल ज़िंदगी गुज़ारते हैं

लेकिन वो बेसहारा मरीज़ों की ख़िदमत कर के अपने रग-ओ-पै में ख़ुशी महसूस करते हैं । उन के ओल्ड एज होम में अब तक 16 मुअम्मरीन की देख भाल की जा चुकी है ।

बहरहाल बालराज ना सिर्फ़ नाफ़रमान औलाद बल्कि फ़िर्क़ा परस्तों दोनों के लिए एक सबक़ हैं । एसा सबक़ जो सिर्फ़ इंसानियत का दरस देता है । जहां जज़बा ख़िदमत-ए-ख़लक़ कूट कूट कर भरा हुआ है ।

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