जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून निर्माण की सुगबुगाहट शुरू !

जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून निर्माण की सुगबुगाहट शुरू !

15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से जब से धानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत की बढ़ती जनसंख्या पर चिंता व्यक्त किया है तब से पूरे देश में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून निर्माण की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपने भाषण में उपयोग में किए गए विशेषण मसलन स्वयं प्रेरणा, स्वैच्छिक सहयोग और देशभक्ति लोगों को झकझोरने के लिए काफी है। क्योंकि लोगों को अच्छी तरह से मालूम है कि जब-जब प्रधानमंत्री मोदी कोई भी कठोर कदम उठाने होते हैं वो लोगों से उनके स्वैच्छिक सहयोग और देशभक्ति की जागृत करके लोगों का मन टटोलते हैं, फिर कठोरतम कदम की ओर आगे बढ़ते हैं।

भारतवासियों के जह्न में आज भी नंबवर, 2016 की नोटबंदी की याद तरोंताजा है जब प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक 500 रुपए और 1000 रुपए के नोटों को प्रचलन से बाहर करने का ऐलान किया था।

नोटबंदी की अप्रत्याशित घोषणा के बाद पूरे देश में हाहाकार जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी और जो लोग जहां भी वहां मौजूद एटीएम केंद्रों की ओर जमा होने को मजूबर हो गए थे। भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए नोटबंदी एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल में लाया गया और देश में बोरियों में बंद काले धन को अपनी आंखों से देखा है। ऐसा नहीं था कि सब कुछ अचानक एक दिन में हुआ। पीएम मोदी ने कुछ बड़ा करने की चेतावनी देते हुए पहले ही लोगों से आयकर रिटर्न भरने और कमाई के सभी स्रोतों की घोषणा करने की अपील की थी, लेकिन लोगों ने नजरंदाज कर दिया और फिर नोटबंदी हुआ और लोगों के होश उड़ गए। यही कारण है कि 15 अगस्त के संबोधन में प्रधानमंत्री द्वारा जनसंख्या विस्फोट पर चिंता करने और जनसंख्या पर अंकुल के लिए लोगों से स्वैच्छिक सहयोग करने को तूफान आने से पहले की शांति के रूप मे देखा जा रहा है।

घर में मौजूद बूढ़े-बुजुर्गों को 25 जून, 1975 लगाए गए आपातकाल की याद ताजा हो गई है जब जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर कांग्रेस के युवा नेता संजय गांधी ने महज एक वर्ष के अंतराल में 60 लाख लोगों की जबरन नसबंदी करवा दी थी। आपातकाल को नजदीकी से देख चुके लोग आज भी बर्बर तरीके से कराई गई नसबंदी को यादकर सिहर जाते हैं।

जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर लोगों को उनके घरों और सड़क से उठाकर नसबंदी कर दिया गया। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की बड़े नेता बनने की महत्वाकांक्षा में यह बर्बरता की गई, जिसे अभी भी नहीं भूला सके हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर जब देश की बढ़ती जनसंख्या और संसाधनों की सीमितता का उल्लेख करते हुए जनसंख्या नियंत्रण करने को लेकरअपील किया तो लोगों के कान खड़े हो गए हैं। जनसंख्या नियंत्रण को देशभक्ति से जोड़ते हुए पीएम मोदी ने इशारों-इशारों में लोगों को इसकी भयावहता को समझाने की कोशिश की, लेकिन पिछले 5 वर्षों में प्रधानमंत्री के रवैये बखूबी वाकिफ रही जनता भविष्य में कठोर कानून आने की आशंका से अभी से घिर गई है।

बर्बर तरीके से 60 लाख लोगों की कर दी गई नसबंदी 25 जून 1975, वो तारीख है जब भारतीय लोकतंत्र पर आपातकाल लगा दिया। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इस दिन को काला दिन कहा जाता है. देश में आपातकाल लागू और नागरिकों के सभी अधिकार छीन लिए गए थे। आपातकाल ने संजय गांधी की महत्वाकांक्षा को पंख लगा दिए और नसबंदी के जरिए एक झटके में बढ़ती आबादी को कम करके वो भारतीय राजनीति के सिरमौर बनने की फिराक में थे।

करीब 60 लाख लोगों का जबरन नसबंदी कराया गया, इनमें 14 से लेकर 60 वर्ष के लोग शामिल थे। इस दौरान ग़लत ऑपरेशनों से दो हज़ार लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 1970 में हुई भारत में नसबंदी अभियान की शुरुआत विश्व बैंक, स्वीडिश इंटरनेशनल डेवेलपमेंट अथॉरिटी और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष से मिले अरबों डॉलर के क़र्ज़ के दम पर भारत में नसबंदी अभियान की शुरुआत 1970 के दशक में है। हालांकि आबादी नियंत्रण के लिए महिला नसबंदी पर अधिक जोर दिया गया, क्योंकि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के विरोध की संभावना कम थी जबकि जबकि महिलाओं के मुक़ाबले पुरुषों की नसबंदी अधिक आसान होती है।

नसबंदी में मुस्लिमों की थी सर्वाधिक भागीदारी आपातकाल के दौरान जनसंख्या नियंत्रण के लिए सबसे पहले मुस्लिमों को चुना गया था। संजय गांधी के मुताबिक नसंबदी की शुरूआत राजधानी दिल्ली से शुरू होना चाहिए और वह भी पुरानी दिल्ली से, जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है। उन दिनों मुस्लिम समुदाय के बीच भ्रांति थी कि जनसंख्या नियंत्रण मुस्लिमों की आबादी घटाने की साजिश है। संजय गांधी को लगा कि वो अगर मुस्लिम समुदाय के बीच नसबंदी कार्यक्रम को सफल बना पाए तो देश भर में एक कड़ा संदेश जाएगा। आंकड़े कहते हैं कि आपातकाल के दौरान हुए नसंबदी में मुस्लिमों का औसत सर्वाधिक था।

नौकरशाहों को समय पर पूरा करना था नसबंदी का लक्ष्य संजय गांधी ने इस फैसले को युद्ध स्तर पर लागू कराना चाहते थे इसलिए सभी सरकारी महकमों को साफ आदेश दे दिया गया था कि नसंबदी के लिए तय लक्ष्य को वह वक्त पर पूरा करें वरना उनकी तनख्वाह रोककर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यही नहीं, इस काम की रिपोर्ट सीधे मुख्यमंत्री दफ्तर को भेजने तक के निर्देश दिए गए थे। यही कारण था कि महज 1 वर्ष में ही नसबंदी के आंकड़े ने 60 लाख छू लिए थे,जो हिटलर की तुलना में 15 गुना अधिक थे।

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