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ज़कात और मदात ख़ैर से गरबा-ए-ओ- मसाकीन की राहत रसानी का सालाना मामूल बाइस बरकात

हैदराबाद १६ अगस्त: रमज़ान उल-मुबारक में नमाज़ और रोज़ा के साथ ज़कोआ की अदायगी और दीगर मदात ख़ैर से गरबा-ए-ओ- मसाकीन ज़रूरतमंदों और नादारों कीग़मख़ारी का मोस्सर मामूल रूह में बालीदगी पैदा करने का मूजिब बनता है।

हैदराबाद १६ अगस्त: रमज़ान उल-मुबारक में नमाज़ और रोज़ा के साथ ज़कोआ की अदायगी और दीगर मदात ख़ैर से गरबा-ए-ओ- मसाकीन ज़रूरतमंदों और नादारों कीग़मख़ारी का मोस्सर मामूल रूह में बालीदगी पैदा करने का मूजिब बनता है।

अल्लाह ताला की राह में अपने माल से कुछ ख़र्च करना, फ़ाक़ा कशों की शिकम सेरी करना, लोगों को कपड़ा पहनाना, बीमारों के ईलाज और दवा का इंतिज़ाम करना, बेसहारा लोगों की मदद करना, ग़ैरतदार क़राबत वालों की इस उम्दगी के साथ माली इआनत करना कि इन की ख़ुद्दारी को ठेस ना लगी, सिला रहमी, क़र्ज़ दारों को मोहलत, सूद की लानत में गिरफ़्तार लोगों को पंजा रुबा से रिहाई का सामान करना, मेहमान नवाज़ी, तलबा-ए-दीन के ख़ुर्द-ओ-नोश का इंतिज़ाम, यतामा-ओ-बीवगान की मआशी मदद और हर वो काम जो मख़लूक़ की राहत रसानी का सबब बने अगरचे कि हरवक़त पसंदीदा और बाइस सवाब है लेकिन ख़ास माह रमज़ान में फ़ी सबील अल्लाह हर ख़र्च अज्र-ओ-इव्ज़ के लिहाज़ से कई गुना ज़्यादा फ़ाइदा बख्श और रज़ाए हक़तआला का मूजिब बनता है।

नेकी-ओ-बहबूदी, सख़ावत-ओ-फ़य्याज़ी, इन्फ़ाक़-ओ-ख़ैरात का हर पहलू फ़रीज़ा ज़कात से मुताल्लिक़ ही। ताहम ज़कात के लिए निसाब-ओ-शरह, शराइत-ओ-ज़वाबत शिरा शरीफ़ मुक़र्रर फ़र्मा दिए हैं।

चूँकि येफ़र्ज़ है इस लिए मख़सूस लोगों पर उन के मख़सूस माल पर एक मुईन-ओ-मुक़र्रर मुद्दत और शरह के साथ है जबकि अल्लाह की राह में ख़र्च करनी, सदक़ा नफ़ल के लिए कोई ख़ास जगह ख़ास वक़्त और ख़ास वजह नहीं बल्कि अल्लाह ताला जिसे तौफ़ीक़ अता करे वो ज़रूरतमंदों की इआनत के लिए जितना चाहे जब और जहां चाहे ख़र्च कर सकता है इस का उसे ज़रूर मुआवज़ा और बदला अता होता है।

डाक्टर सय्यद मुहम्मद हमीद उद्दीन शरफ़ी डायरैक्टर आई हरक ने रमज़ान मुबारक के रूह प्रवर माहौल में 25 रमज़ान उल-मुबारक को क़ब्ल इफ़तार 6 बजे शाम हमीदिया शरफ़ी चमन में रोज़ा दारों के इजतिमा से ख़िताब की सआदत हासिल करते हुए इन हक़ायक़ का इज़हार किया।

वो इस्लामिक हिस्ट्री रिसर्च कौंसल इंडिया (आई हरक) के हज़रत ताज अलारफ़ाइऒ यादगार ख़ताबात के सोलहवीं साल के 25 वें रोज़ के इजलास से ख़िताब कर रहे थे जो क़रणत कलाम पाक से शुरू हुआ। बारगाह शहंशाह-ए-कोनीन ऐ मैं हदया नाअत पेश की गई। डाक्टर हमीद उद्दीन शरफ़ी ने कहाकि सख़ावत के कई पहलू हैं इन में अफ़ज़ल तरीन माली ईसार यानी अता-ओ-बख़शिश और दाद-ओ-दहश है।

यानी अल्लाह की राह में अल्लाह के बंदों पर अपना माल ख़र्च करना, माली ईसार, कई इस्तिलाही नामों से जाना जाता है जिन में से एक सदक़ा भी है जिस की बड़ी फ़ज़ीलत आई है। ये ख़ताओं को मिटाने का बाइस बनता ही। जो लोग अल्लाह की रज़ा की ख़ातिर माली ईसार करते हैं अपने माल को मुस्तहिक़ लोगों में तक़सीम करते हैं अल्लाह ताला उन्हें ना सिर्फ दुनिया में इस का बदला चंद दह चंद अता फ़रमाता है बल्कि आख़िरत में भी अज्र अज़ीम से नवाज़ता है।

उन्हों ने अहादीस के मफ़ाहीम के हवाला से बताया कि बंदा जब राह-ए-ख़ुदा मैं देता है तो क़ियामत के दिन उस की ये फ़य्याज़ी-ओ-सख़ावत इस का साया होगा। जब मुस्लमान अपने घर वालों पर उन की ज़रूरत के मुवाफ़िक़ ख़र्च करता है तो ये भी इस के लिए बाइस अज्र-ओ-सवाब बनता ही।माली ईसार के सिलसिला में यहां तक आया है कि हर नेक काम में ख़र्च किए जाने वाले रुपया का बदल-ओ-सवाब है लेकिन जो रुपया अपने घर वालों और अज़ीज़ अका़रिब की जरूरतों पर ख़र्च किया जाता है अज्र-ओ-फ़ज़ीलत में एक गौना ज़्यादा है।

इजलास के आख़िर में बारगाह रिसालत ई में सलाम पेश किया गया और रक्त अंगेज़ दुआ की गई।

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