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ज़ाती मकान की ख़ाहिश में 20 बर्सों से झोंपड़ी में क़ियाम

हर इंसान को इस बात की ख़ाहिश रहती है कि वो एक ख़ुशहाल ज़िंदगी गुज़ारे, रहने के लिए अपना एक ज़ाती घर हो,घूमने फिरने के लिए सवारी हो, ग़र्ज़ इंसान रोटी कपड़ा और मकान के लिए अपनी सारी ज़िंदगी सर्फ़ कर देता है। अगर उसे ज़िंदगी में ही ज़ात

हर इंसान को इस बात की ख़ाहिश रहती है कि वो एक ख़ुशहाल ज़िंदगी गुज़ारे, रहने के लिए अपना एक ज़ाती घर हो,घूमने फिरने के लिए सवारी हो, ग़र्ज़ इंसान रोटी कपड़ा और मकान के लिए अपनी सारी ज़िंदगी सर्फ़ कर देता है। अगर उसे ज़िंदगी में ही ज़ाती मकान मिल जाए तो वो उसे अपने और अपने ख़ानदान के लिए उसे एक नेअमत ग़ैर मुतरक़्क़बा समझता है।

कम अज़ कम हम हिंदुस्तानियों में तो अपने ज़ाती मकान की ख़ाहिश कूट-कूट कर होती है और इस के हुसूल के लिए वो सख़्त से सख़्त मेहनत करने से भी गुरेज़ नहीं करते। बा अल्फ़ाज़ दीगर कड़ी से कड़ी आज़माईशों से गुज़रने के लिए भी तैयार हो जाते हैं।

निज़ाम उद्दीन ने बताया कि इमरान के वालिद का देढ़ साल क़ब्ल इंतिक़ाल हुआ जब कि वालिदा एक साल पहले इस दार फ़ानी से कूच कर गई। चूँकि लड़का यतीम-ओ-यसीर है इस लिए उन्हों ने उसे अपने पास रख लिया ताकि तालीम के साथ साथ कुछ काम काज सीख ले। नुमाइश के दौरान ये लोग बंबू के ज़रीया झंडियों की लकड़ियां बनाने का काम रोक देते हैं।

45 यौम तक वो गुब्बारे, बच्चों के खिलौने, पट्टियां फरोख्त करते हैं या फिर तलन की अशीया फरोख्त करके अपना गुज़ारा कर लेते हैं। सैयद निज़ाम उद्दीन ने बताया कि शहर में सयासी सरगर्मीयां सर्द पड़ जाती हैं धरने नहीं होते तो उन का कारोबार मुतास्सिर होता है।

ऐसे में वो रिकसा चलाने पर मजबूर हो जाता है क्योंकि एक दिन भी बेकार जाता है तो वो कई दिन पीछे हो जाते हैं। उन लोगों ने जो दौरान बातचीत भी पूरी तनदही के साथ काम कर रहे थे बताया कि वो सुबह 7 बजे से काम शुरू करते हैं जो शाम 7 बजे तक जारी रहता है।

ग़रीबी भूक-ओ-इफ़लास से मुक़ाबला के लिए हर रोज़ ज़िंदगी से लड़ना पड़ता है। तब जाकर 300 – 250 रुपये की आमदनी हो जाती है। फौज़िया बेगम ने अपने शौहर की तारीफ़-ओ-सताइश करते हुए कहा कि सैयद निज़ाम उद्दीन अपनी बीवी बच्चों का ख़ास ख़्याल रखते हैं। मेहनत से जी नहीं चुराते और काम को इबादत की तरह अंजाम देते हैं।

इस ख़ातून ने बताया कि वो बड़ी मेहनत-ओ-मशक़्क़त करते हैं लेकिन हम अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर अच्छे और कामयाब इंसान बनाना चाहते हैं। सैयद निज़ाम उद्दीन ने दरमयान में मुदाख़िलत करते हुए कहा कि वो नहीं चाहता कि इस के बच्चे भी यही काम करते रहें। इस लिए उस ने सरकारी स्कूल में इन बच्चों और 12 साला इमरान को दाख़िल करवाया।

सैयद निज़ाम उद्दीन और उन की अहलिया फौज़िया बेगम से बातचीत करने से अंदाज़ा हुआ कि वो एक ज़ाती मकान के लिए जिस क़दर सख़्त मेहनत कर रहे हैं मुम्किन है कि वो अपने मक़सद में कामयाब भी हो जाएंगे।

लेकिन ग़रीबों को मकानात अलॉट करने का दावा करनेवाली हुकूमत की नज़र आख़िर सैयद निज़ाम उद्दीन और फौज़िया बेगम जैसे लोगों पर क्यों नहीं पड़ती। काश हुकूमत और सरकारी महिकमा शहर के मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर झोंपड़ियों में रहने वालों की ख़बर लेती।

उन्हें ठिकाना फ़राहम करती तो कितना बेहतर होता क्योंकि बारिश होती है तो ये लोग झोंपड़ीयाँ छोड़कर मुअज़्ज़म जाहि मार्किट या दीगर महफ़ूज़ मुक़ामात के साए में रातें गुज़ारते हैं।

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