Friday , December 15 2017

जिल हज्जा के फज़ायल

नबी करीम (स०अ०व०) ने इरशाद फरमाया कि जिल हिज्जा के शुरू दस दिनों में किया जाने वाला हर नेक अमल अल्लाह को इतना महबूब है कि दूसरे दिनों में उतना नहीं। इसी तरह दूसरी हदीस में आप (स०अ०व०) ने फरमाया कि जिल हिज्जा के महीने में पहले अशरे के ह

नबी करीम (स०अ०व०) ने इरशाद फरमाया कि जिल हिज्जा के शुरू दस दिनों में किया जाने वाला हर नेक अमल अल्लाह को इतना महबूब है कि दूसरे दिनों में उतना नहीं। इसी तरह दूसरी हदीस में आप (स०अ०व०) ने फरमाया कि जिल हिज्जा के महीने में पहले अशरे के हर दिन का रोजा एक साल के रोजो के बराबर है और हर रात का जागना शबे कद्र की रात के जागने के बराबर है। इसी तरह एक और हदीस में आप (स०अ०व०) ने इरशाद फरमाया कि यौमे अरफा का रोजा रखो ताकि तुम्हारे एक साल पहले और एक साल बाद के तमाम गुनाह माफ कर दिए जाएं।

अजीज दोस्तो! इस मुबारक महीने में तमाम मुसलमानों के लिए सबसे ज्यादा खुशी और मसर्रत का सामान ईद उल अजहा है। पूरे साल में मुसलमानों के लिए दो त्योहार होते हैं एक ईद-उल-फित्र और एक ईद-उल-अजहा। ईद उल फित्र तो रोजा, तरावीह शबे कद्र और एतकाफ जैसी अहम तरीन इबादातों के सिले में अता की गई है लेकिन ईद उल अजहा दरअस्ल सैयदना इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की यादगार है। यह उनकी बेमिसाल कुर्बानियों की यादगार है जिसे अल्लाह तआला ने अव्वलतरीन इबादत करार दिया। अगर देखा जाए तो हजारों लोग कुर्बानियां दे चुके हैं। हर मजहब और हर मआशरे और हर कौम में कुर्बानियां दी जाती रही है लेकिन सैयदना इब्राहीम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी को जो मुकाम हासिल है वह मुकाम किसी को हासिल नहीं है। उनकी अजीम कुर्बानी की यादगार में यह ईद उल अजहा अता की गई है।

दुनिया में हजारों लोग ईद मनाते हैं लेकिन उनका अंदाजे रस्म व रिवाज, तौर-तरीके मुख्तलिफ हैं लेकिन दीने इस्लाम ही एक वाहिद दीन है जो रोज अव्वल से ही इसकी मुखालिफत करता आ रहा है बल्कि दीने इस्लाम हर ईद में अल्लाह की रजा और खुशनूदी को हासिल करता है। यही वजह है कि मुसलमान जब कुर्बानी करता है तो उसका जमीर जाग उठता है और वह अल्लाह के लिए अपनी तमाम जायदाद व माल को आसानी से कुर्बान करने के लिए तैयार हो जाता है।

आखिर में दुआ है कि अल्लाह तआला तमाम मुसलमानों को यह फरीजा इंतिहाई एहतेमाम और एहतेराम के साथ अदा करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन (मोहम्मद ओसामा कासमी इब्ने अब्दुर्रब सिद्दीकी )

—– बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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