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जिस उम्र में औरतें सजती-संवरती है, मैं उस उम्र में लोहे का औजार लेकर पंचर बनाती हूं

लखनऊ: औरत को शायद ही कभी पंचर बनाते हुए देखा या सुना होगा। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद के गंगापुरवा गांव की रहने वाली तरन्नुम एक ऐसी महिला हैं जो अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए पंचर बनाती हैं। ये ‘तरन्नुम पंचर वाली’ के नाम से मशहूर हैं और जानकीपुरम विस्तार के मुलायम तिराहे पर इनका दुकान है। 35 वर्षीय तरन्नुम न सिर्फ पंचर बनाती हैं बल्कि पेंटिंग भी करती हैं।

तरन्नुम बताती हैं कि शादी के बाद जिन्दगी बिलकुल उजड़ गई। बीमारी की वजह से पति ठीक से काम नहीं कर पाते थे, उसके बाद उनको घर से निकलना पड़ा। वो किसी के घर पर काम नहीं कर सकती थी तो पति के पंचर की दुकान पर ही काम करने लगी। वो कहती हैं कि अब तो उनको ऐसी आदत हो गई है कि अगर दुकान पर नहीं जाएं तो शरीर में दर्द होने लगता है।

तरन्नुम उदास मन से कहती हैं, “आप अगर गरीब होते है तो कोई पूछने वाला नहीं होता है। मेरे ससुरालवाले हो या मायके वाले किसी ने भी गरीबी में मेरा साथ नहीं दिया। मैं साईकिल से लेकर ट्रक तक के पंचर बनाती हूं। पंचर बनाने के अलावा पेंटिंग भी करती हूं। मेरे पति कमजोर थे तो मैं उनकी मदद करने आई। यहीं तो होता है कि अगर पति कमजोर हो तो पत्नी साथ दे। और अगर पत्नी कमजोर हो तो पति को साथ देना चाहिए।

वो कहती हैं कि शादी के बाद उनकी जिंदगी जैसे-तैसे घर चल रहा था। लेकिन जब बच्चे हुए तो उनको चीजों के लिए रोता हुआ नहीं देख सकती थीं। पति का पंचर बनाने का काम था धीरे-धीरे उसी में हाथ बटाने लगी। शुरुआत में कुछ दिन तक परेशान रही, लेकिन कुछ दिनों बाद आदत ऐसी हो गई है कि अगर काम न करूं तो बीमार हो जाती हूं। मैं रोजाना दो सौ से चार सौ रुपए कमा लेती हूं। ताकि मेरी बेटी सुखी रह सके।

तरन्नुम बताती हैं कि उनके तीन बच्चे हैं। उसमें एक बेटी है। वो कहती हैं, “मैं जिस तरह की जिंदगी जीने को मजबूर हूं, मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी भी ऐसी जिंदगी गुजारे। मैं उसे एक खूबसूरत दुनिया देना चाहती हूं। जिस उम्र में औरतें सजती-संवरती है, उस उम्र में मैं लोहे का औजार लेकर पंचर बनाने का काम शुरू कर दी थी। मुझे याद नहीं कि आखिरी बार हाथ में मेहंदी कब लगाई थी। मैं औरत हूँ, लेकिन मेरे हाथ मुलायम नहीं है। इस हाथ में ढट्टे निकले हुए हैं।

वो कहती हैं कि अधिकतर ग्राहक मुझे पंचर बनाता देख हैरान होते है। कुछ लोग तो मेरी तारीफ करते हुए एक्स्ट्रा पैसे दे जाते हैं। लेकिन कुछ लोग मेरा मजाक भी बनाते हैं। लोगों के मजाक बनाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जब मेरे पास खाने को नहीं था तब कोई खाने को देने नहीं आया था। अब मैं किसी की बातों का ख्याल नहीं करती।

तरन्नुम के पति भावुक होकर तरन्नुम का शुक्रिया अद करते हैं। कलीम अली बताते है, “मैं शुरू से ही बीमार रहता हूं। शादी के बाद जब मुझे जिम्मेदारी संभालनी थी लेकिन मैं पीछे रह गया। मेरी पत्नी आगे आई और सब कुछ संभाल ली। मैं कभी-कभी शर्मिंदा भी होता हूं और तरन्नुम पर गर्व भी करता हूं।

 

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