जिस जगह बाबरी मस्जिद थी, वहीं भगवान राम का जन्म हुआ, इसका क्या सबूत है?- मुस्लिम पक्षकार

जिस जगह बाबरी मस्जिद थी, वहीं भगवान राम का जन्म हुआ, इसका क्या सबूत है?- मुस्लिम पक्षकार
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अयोध्या-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से नई याचिका दायर की गई। याचिका में कहा गया है कि मुस्लिमों में बहुविवाह के मसले से ज्यादा जरूरी अयोध्या का मसला है और इसे बड़ी बेंच के पास सुनवाई के लिए भेजा जाना चाहिए।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा ने कहा कि इस मामले में सभी पार्टियों की सुनवाई के बाद फैसला लिया जाएगा। बता दें कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं और अब केवल मुख्य पक्षकारों की याचिका पर सुनवाई की जा रही है।

मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने कहा, “मुस्लिमों के बीच बहुविवाह से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण अयोध्या विवाद है। पूरा देश इस मामले में जवाब चाहता है।”

पिछले महीने सुनवाई के दौरान धवन ने कहा था, “भगवान राम के लाखों साल पहले अयोध्या में जन्म लेने का दावा किया जाता है। लेकिन वह विवादित जगह पर ही जन्मे थे, उसका क्या प्रमाण है?”

पिछली सुनवाई पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अब्दुल नजीर और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने कहा कि मौजूदा टाइटल सूट पर फैसले से पहले वह तय करेंगे कि कोर्ट के 1994 के एक फैसले को संविधान पीठ के पास भेजने की जरूरत है या नहीं।

1994 के मो. इस्माइल फारुखी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, इस्लाम के लिए मस्जिद अनिवार्य नहीं है। मुस्लिम कहीं भी, और तो और खुले में भी नमाज अदा कर सकते हैं। यह मामला अयोध्या एक्ट, 1993 से जुड़ा है।

इस पर धवन ने कहा था, “भारत में हिंदुओं के लिए धार्मिक लिहाज से कई अहम इमारतें हैं। मुस्लिमों के लिए कोई नहीं है। उन्होंने कहा कि 1994 का फैसला अनुच्छेद 25 के तहत मिले आस्था के अधिकार को कम करता है। कानून की सीमा में बंधकर आप मंदिर या मस्जिद नहीं तोड़ सकते।

1994 के फैसले में कहा गया है कि मुस्लिम कहीं भी नमाज पढ़ सकते हैं। जज का यह तर्क थोपा गया था। अगर मेरे लिए मस्जिद महत्वपूर्ण है तो आप मुझ पर उंगली नहीं उठा सकते। जज का यह कहना कि मस्जिद हमेशा मस्जिद नहीं रहती, गलत है।”

तीन मुख्य पक्षकारों के अलावा एक दर्जन अन्य पक्षकार भी हैं। इनमें श्याम बेनेगल, तीस्ता सीतलवाड़, अपर्णा सेन, अनिल धारेकर और सुब्रमण्यन स्वामी की याचिकाएं भी शामिल थीं।

इन्हें खारिज कर दिया गया है। हालांकि, स्वामी की रिट पिटीशन पर सुनवाई जारी रहेगी। इसमें उन्होंने कहा था, “प्रार्थना करना मेरा मूलभूत अधिकार है और ये अधिकार संपत्ति के अधिकार से बड़ा है।’

राम मंदिर के समर्थन में आए पक्षकारों का कहना है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 90 सुनवाई में ही फैसला दे दिया था। पक्षकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट 50 सुनवाई में फैसला दे सकता है।

बाबरी मस्जिद से जुड़े पक्षकार ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि केस में दस्तावेजों का अंबार हैं, उन सभी पर प्वाइंट टू प्वाइंट दलीलें रखी जाएंगी।

हिंदू महासभा के वकील विष्णु शंकर जैन नेे बताया कि केस में 7 भाषाओं हिंदी, उर्दू, पाली, संस्कृत, अरबी आदि के ट्रांसलेटेड डॉक्युमेंट्स जमा हो चुके हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में विवादित 2.77 एकड़ जमीन 3 बराबर हिस्सों में बांटने का ऑर्डर दिया था। अदालत ने रामलला की मूर्ति वाली जगह रामलला विराजमान को दी। सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को और बाकी हिस्सा मस्जिद निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया था।

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