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जेएनयू रेप केस : महिला हितों की बात करने वाले अपने संगठन के किसी व्यक्ति आरोप लगते ही क्यों साध जाते हैं चुप्पी

जेएनयू में पीएचडी की छात्रा से रेप का मामला गरमाया हुआ है। एक साल में यह तीसरा मामला है जब आइसा के कार्यकर्ता पर इस तरह का गंभीर आरोप लगा है। पीएचडी की जिस छात्रा ने रेप का आरोप लगाया है। ऐसे में प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में होने वाली ऐसी गंभीर घटनाओं पर गंभीरता से क्यों नहीं लिया जा रहा है। ओपिनियन पोस्ट ने मामले की पड़ताल करने की कोशिश की और मामले में सच जानने की कोशिश की जेएनयू की उन महिला छात्रों से, महिला शिक्षा विदों से, ऐसी महिलाओं से जो जेएनयू में छात्र संगठनों से जुड़ी हुई हैं या सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर महिलाओं के मुद्दों को गंभीरता से उठाने वाली महिलाओं से।

लाइफ साइंस की छात्र जेनी जो जेएनयू में पीएचडी कर रही हैं। बिहार की रहने वाली हैं लेकिन अब इनका परिवार बनारस में रहता है बताती हैं कि जेएनयू एक प्रतिष्ठित संस्थान है लेकिन ऐसी घटनाएं लड़कियों के मन में खौफ पैदा करती हैं। ऐसी घटनाओं के बाद हर लड़की को आजादी के नाम से डर लगेगा है। हालही में जब नए बैच के एडमिशन हो रहे थे तो हर लड़की के माता-पिता यही पूछ रहे थे कि जगह तो सुरक्षित है ना हमने उन्हें भरोसा दिया था कि जगह बिल्कुल सुरक्षित है लेकिन जब इसी प्रतिष्ठित संस्थान में ऐसी घटनाएं मीडिया के जरिए सामने आती हैं तो हर कोई डर जाता है। मैं इस कैंपस में नई नहीं हूं लेकिन एक साल में एक ही संगठन की इस तरह की शर्मनाक घटना सामने आई है अगर पहले इस तरह की घटनाओं को रोका नहीं गया तो क्या आगे रूक पाएंगी। ऐसा होना अंभव लगता है। एक ऐसा शख्स इस घटना को अंजाम देता है जो नारीवाद को समझता है, जो आइडियोलॉजी को जानता है जिसे कानून की जानकारी है, लेकिन उसमें किसी का भी डर नहीं हैं। ऐसे में इन मामलों पर प्रशासन को, पुलिस को, संगठनों को गंभीरता से काम करना चाहिए ताकि ऐसे लोगों में खौफ पैदा हो ऐसी घटनाओं को अंजाम देने से पहले।

श्रुति जो कानपुर की रहने वाली हैं जेएनयू से पीएचडी कर रही हैं कहती है कि महिलाओं की सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए। हर कोई प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने के लिए आता है, एक भरोसे से आता है लेकिन अगर इस तरह की घटनाएं होंगी तो कौन यहां पढ़ने आएगा। मामले पर अभी तक कुछ नहीं हो पाया है। हाथ पर हाथ रखकर बैठने से कुछ नहीं होगा। 48 घंटे बीत चुके हैं आरोपी अब भी फरार है। पुलिस क्या कर रही है, प्रशासन क्या कर रहा है। अगर इसी तरह से ढील बर्ती जाती रही तो किसी का भी संस्थान और न्याय पर भरोसा नहीं रहेगा। ऐसे असामाजिक तत्वों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई होनी चाहिए ताकि सबको सबक मिले की गलत करने का मतलब कड़ी सजा है।

अॉल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन की प्रदेश संयोजक रहिला परवीन का कहना है कि मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। पीड़िता का नाम उजागर नहीं किया जाना चाहिए। एआईएसफ पीड़िता की हर संभव मदद के लिए आगे आया है। 21 वीं शताब्दी में हम रह रहे हैं लेकिन हमारी मानसिकता नहीं बदली है। ऐसे लोग अब भी महिलाओं को भोग की वस्तु मानते हैं लेकिन इन लोगों को बिल्कुल माफ नहीं किया जाएगा इनके विरूद्ध हम कानून के तहत कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं।

रहिला कहती हैं मामले पर राजनीति शुरू हो गई है एबीवीपी अपने विरोधियों पर निशाने साध रहा है लेकिन ऐसा करने से अच्छा होगा कि ऐसे संगठन पीड़िता के लिए कुछ करें। ऐसे लोग वामपंथ पर अटैक कर रहे हैं लेकिन इन लोगों से मैं कहना चाहूंगी कि आइसा को मैं वामपंथी नहीं मानती। ऐसा संगठन जिसका इतिहास ही इस तरह की मानसिकता और कामों से भरा पड़ा हो क्या वह संगठन प्रगतिशील विचारधारा का हिस्सा हो सकता है? ऐसा संगठन किसी तरह से भी वामपंथ का हिस्सा नहीं हो सकता। वामपंथ प्रगतिशीलता की बात करता है, आजादी की बात करता है, संकीर्णता की बात नहीं करता। आप पूछिए आइसा के उन लोगों से जो महिलाओं के हितों को लेकर आंदोलन करते हैं, सड़कों पर उतरते हैं और जब अपनी संस्था के किसी व्यक्ति पर ऐसे आरोप लगते हैं तो चुप्पी साध कर कमरे में बैठ जाते हैं।

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन जो की ‘लिबरेशन’ मतलब आजादी नाम की मैगज़ीन की संपादक भी हैं। कविता से जब ओपिनियन पोस्ट ने बात करनी चाही तो उन्होंने मैंगजीन में व्यस्त होने की बात करके मामले पर कुछ नहीं बोला। जब उनसे कहा गया कि ऐसे गंभीर मामले को आप अनदेखा या अनसुना कैसे कर सकती हैं तो उन्होंने कहा कि मैं आइसा के बयान के साथ हूं। और मैं मामले को अनदेखा नहीं कर रही हूं।

दरअसल,, कविता कृष्णन निर्भया रेप केस को लोगों के बीच लाने के लिए जानी जाती हैं यही नहीं कविता सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं वह महिलाओं के हित में आवाज उठाती रहती हैं लेकिन सवाल उठता है कि क्या अपने खेमे के लोग अगर अपराध करते हैं तो क्या अपराध कम हो जाता है।

बता दें कि आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता ने हर कीमत पर पीड़िता को इंसाफ दिलाने की बात कही है। जेएनयू के भीतर मजबूत माने जाने वाले छात्र संगठन आइसा के एक कार्यकर्ता पर बलात्कार का आरोप है। आइसा अध्यक्ष ने पीड़ित छात्रा का साथ देते हुए  आरोपी कार्यकर्ता के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है।

जेएनयू में होती ऐसी घटनाएं गवाह हो जाती हैं उन संगठनों की बातों और इरादों की जो महिलाओं के बेखौफ आजादी का ढिंडोरा पिटते हैं। लेकिन जब एक के बाद एक ऐसी गंभीर घटनाएं सामने आती हैं तो ऐसे लोग चुप्पी साध लेते हैं।

साभार : opinionpost

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