Thursday , December 14 2017

टूटने के कगार पर यूरोपियन यूनियन

यूनियन टूटने के कगार पर है। यूनियन छोड़ने के लिए ब्रिटेन के भीतर भारी दबाव बन रहा है। आगामी 23 जून को ब्रिटेन में जनमत संग्रह होगा जिसमें वहां की जनता फैसला करेगी कि उनका देश यूरोपियन यूनियन का सदस्य बना रहे या फिर उससे बाहर आ जाये। हालांकि, जर्मनी व फ्रांस समेत सभी 27 सदस्य देशों ने यूरोपियन यूनियन को टूटने से बचाने के लिए ब्रिटेन को विशेष दर्जा देने का फैसला किया है।
लेकिन शरणार्थियों समेत मनमुटाव के कुछ मुद्दों पर अभी भी सदस्य देशों में गतिरोध बना हुआ है। ब्रिटेन इस वक़्त यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी है। उसके यूरोपियन यूनियन से बाहर आ जाने के परिणाम बड़े संगीन होंगे। यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन दोनों के आर्थिक हित मुतासिर होंगे। इससे राष्ट्रवादी ताकतों के हौसले बुलंद होंगे। कई सदस्य देशों में ‘बार्डर फ्री यूरोप’ के खिलाफ आवाजें पहले से उठ रही हैं। ‘बार्डर फ्री यूरोप’ मुआहिदे के तहत सदस्य देशों के नागरिकों को एक-दूसरे देश में पासपोर्ट, वीजा आदि की अनिवार्यता के बिना आने-जाने की छूट है। इसी का फायदा उठाकर गरीब देशों से लाखों शरणार्थी यूरोपीय देशों में दाखिल कर चुके हैं। इससे उनकी इकॉनमी पर भारी दबाव बन गया है।

शरणार्थी संकट यूरोपियन यूनियन की सबसे बड़ी चुनौती है। अकेले तुर्की से कोई 42 हजार शरणार्थी ग्रीस पहुंच चुके हैं। ग्रीस पहले ही दीवालियेपन से जूझ रहा है। उस पर भारी कर्ज बकाया है। यूरोपियन यूनियन के सदस्य देश एक बार ग्रीस को ‘बेल आउट’ कर भी चुके हैं। गरीब मुल्कों से करीब 16 लाख शरणार्थी यूरोपीय देशों में पहुंच चुके हैं। ज्यादातर शरणार्थी तुर्की और भूमध्य सागर के रास्ते यूरोपीय देशों में दाखिल हो रहे हैं। सरहद की हिफाज़त और शरणार्थियों के बंटवारे को लेकर सदस्य देशों में गहरा मनमुटाव पैदा हो गया है।

यूरोपीय यूनियन की आर्थिक नीतियों पर कई सदस्य देशों में परस्पर विवाद बना हुआ है। ग्रीस, इटली और पुर्तगाल आर्थिक सुधारवादी नीतियों का विरोध कर रहे हैं। लेकिन यूरोपीय यूनियन के सबसे बड़े देश जर्मनी और फ्रांस सुधारवादी नीतियों पर जोर दे रहे हैं।

यूरोपियन यूनियन के सामने दो सबसे बड़े मुद्दे हैं। वे हैं एकीकरण एवं विस्तार। नये राष्ट्रों को यूरोपीय संघ में जगह देना बड़ा सियासी मुद्दा बना हुआ है। नये राष्ट्रों के समावेश का समर्थन करने वालों का मानना है कि इससे लोकतंत्र का विस्तार होता है एवं यूरोपीय इकॉनमी को भी संबल मिलता है। जबकि विरोध करने वालों का मानना है कि यूनियन अपनी मौजूदा सियासी क्षमताओं एवं भौगोलिक सरहदों से बाहर जा रही है जो सदस्य देशों के हित में नहीं है।

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