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ट्यूनिशिया: बिन अली की बेदख़ली के दो साल

अरब ममालिक में आने वाले इन्क़िलाब का आग़ाज़ ट्यूनीशिया से हुआ था। अवाम ने आज़ादी और तरक़्क़ी के लिए चार हफ़्तों तक मुज़ाहिरे किए, जिस के नतीजे में साबिक़ सदर ज़ैनुल आबेदीन बिन अली को 14 जनवरी 2011 को मुल्क से फ़रार होना था।

अरब ममालिक में आने वाले इन्क़िलाब का आग़ाज़ ट्यूनीशिया से हुआ था। अवाम ने आज़ादी और तरक़्क़ी के लिए चार हफ़्तों तक मुज़ाहिरे किए, जिस के नतीजे में साबिक़ सदर ज़ैनुल आबेदीन बिन अली को 14 जनवरी 2011 को मुल्क से फ़रार होना था।

ट्यूनीशिया में ज़ैनुल आबेदीन बिन अली की इक़तिदार से बेदख़ली को कल दो साल मुकम्मल हो गए। बिन अली ने बीस साल से ज़ाइद इस मुल्क पर हुक्मरानी की थी। अवाम पुरउम्मीद थे कि बिन अली के बाद मुल्क में जम्हूरियत फ़रोग़ पाएगी लेकिन ये अमल बहुत सुस्त रवी के साथ आगे बढ़ रहा है।

ट्यूनीशिया के अवाम को उम्मीद थी कि बिन अली के बाद मुल्क में तरक़्क़ी होगी, आज़ादी होगी। ताहम आज दो साल बाद भी बहुत से मसाइल पहले की तरह मौजूद हैं। मुहम्मद नामी एक तालिब-ए-इल्म का कहना है कि इन्क़िलाब के समरात अभी तक दिखाई नहीं दे रहे। हालात बहुत बेहतर हो सकते थे। मुआशरे में अभी भी बहुत से मसाइल मौजूद हैं। हुकूमत और अपोजीशन की जानिब से भी मसाइल को हवा दी जा रही है। अगर ये एक दूसरे के साथ मिल कर काम करें तो मुआमलात तेज़ी से बेहतरी की जानिबबढ़ सकते हैं।

ट्यूनीशिया की मईशत मुल्क में आने वाले इन्क़िलाब से मुतास्सिर हो रही है। ग़ैर यक़ीनी सूरत-ए-हाल की वजह से सय्याहों में ख़ौफ़ पाया जाता है जबकि ग़ैर मुल्की ताजिर आए दिन होने वाले मुज़ाहिरों से तंग आकर ट्यूनीशिया में सरमाया कारी करने से घबरा रहे हैं। एकजानिब ट्यूनीशिया में अशीया-ए-ख़ुर्द नोश की क़ीमतें बढ़ रही हैं और दूसरी तरफ़ अवाम की जेबें ख़ाली होती जा रही हैं। इन हालात की वजह से अवाम आए दिन एहतेजाजन सड़कों पर निकलते रहते हैं।

सरकारी आदाद-ओ-शुमार के मुताबिक़ मुल्क में बेरोज़गारी की शरह सतरह फ़ीसद तक पहुंच चुकी है, जो बिन अली के दौर-ए-हकूमत के मुक़ाबले में ज़्यादा है। मुल्क के ऐसे भी कुछ शहर हैं, जहां की निस्फ़ से ज़ाइद आबादी के पास रोज़गार नहीं है।

वकील हयात जज़र भी हुकूमत पर अपना ग़ुस्सा निकालने के लिए एहतिजाज में शरीक होती रहती हैं। ना तो इस मुल्क में इंसाफ़ है और ना ही रोज़गार। अवाम की ख़ाहिशात का एहतिराम बिलकुल भी नहीं किया जाता। हुकूमत अलनहज़ा की मदद से मुआमलात दबाने की कोशिश करती है। ऐसा लगता है कि ट्यूनीशिया में जल्द बिन अली के दौर की तरह की हुकूमत क़ायम होने वाली है।

ट्यूनीशिया में इन्क़िलाब के बाद अवाम ने आईन में तबदीली का मुतालिबा किया था ताकि आइन्दा कभी कोई आमिर मुल्क पर हुकूमत ना कर सके। अक्तूबर 2011में आम इंतिख़ाबात के बाद अभी तक ये काम मुकम्मल नहीं हो सका है। इस सूरत-ए-हाल में भी शहरीयों की एक बड़ी तादाद ने उम्मीद का दामन हाथ से नहीं छोड़ा है। उन्हें मुकम्मल भरोसा है कि एक दिन ट्यूनीशिया में जम्हूरियत का हक़ीक़ी माअनों में ज़रूर बोल बाला होगा।( एजेंसी)

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