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डेरा इस्माईल ख़ान में पत्थरों के ज़माने वाला गाँव

डेरा इस्माईल ख़ान के क़रीब पत्थरों के ज़माना में बसने वाला गावें जहां चार हज़ार बासी आज भी पीने के साफ़ पानी ,मर्कज़ सेहत और तालीम से महरूम हैं ,लोगों के पास गावं से नक़्ल-ए-मकानी के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं रहा। दर्राह पीज़ो से छः किलो मी

डेरा इस्माईल ख़ान के क़रीब पत्थरों के ज़माना में बसने वाला गावें जहां चार हज़ार बासी आज भी पीने के साफ़ पानी ,मर्कज़ सेहत और तालीम से महरूम हैं ,लोगों के पास गावं से नक़्ल-ए-मकानी के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं रहा। दर्राह पीज़ो से छः किलो मीटर के फ़ासले पर 18 वीं सदी में बसने वालागा वीं वा नड्डा जंदर के चार हज़ार इंसान आबाद हैं।

जिन का कहना है कि हमारा गावं पाकिस्तान के नक़्शे पर तो है मगर लगता है सूबा ख़ैबर पख़तून ख़ाह के नक़्शा पर मौजूद नहीं। इन लोगों को बेरंग-ओ-बेबो पानी मयस्सर नहीं।।जब कभी सरकारी पानी आता है तो लोग बस उसकी धार ही देखते हैं।

1964 में यहां क़ायम होने वाले स्कूल में दो सौ बच्चों के लिए बिजली है नापा नी और ना फ़र्नीचर, सिर्फ एक उस्ताद , क्लास में नई किताबें रस्सीयों और लिफाफों में क़ैद पड़ी हैं बच्चों के पैरों में जूते पहनने का फ़ैशन कम ही है। सयासी एम पी ए ,एम एन ए तवज्जा नहीं देते ,आफ़िसरान बाला उस्तादों से पूछते हैं कि आप वानडा जंदर जाते हैं ,तो कोई भी स्कूल नहीं जाता।

स्कूल में बच्चीयां कई सालों से उस्तानी की राह तक रही हैं। मासूमियत की ये तस्वीरें स्कूल में पढ़ने की बजाय खेल कूद में वक़्त गुज़ारती हैं। गावं वानडा जंदर में पत्थरों के ज़माने की याद तो ताज़ा हो गई मगर इस कहानी में ख़ुशी की बात ये है कि स्कूल में रोज़ाना क़ौमी पर्चम इस दुआ के साथ लहराया जाता है कि या रब मरे वतन का पर्चम बुलंद रखना।

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