Tuesday , December 12 2017

डॉक्टर देहातों में खिदमत करने के लीये तैयार नहीं : ग़ुलाम नबी आज़ाद

हुकूमत ने अब ये पक्का इरादा कर लिया है कि एम बी बी एस करने वाले डाक्टरों को किसी शहरी हास्पिटल में नौकरी या ख़ानगी ( निजी) दवाख़ाना खोलने से पहले तीन साल तक देहातों में खिदमत करना जरुरी होगा

हुकूमत ने अब ये पक्का इरादा कर लिया है कि एम बी बी एस करने वाले डाक्टरों को किसी शहरी हास्पिटल में नौकरी या ख़ानगी ( निजी) दवाख़ाना खोलने से पहले तीन साल तक देहातों में खिदमत करना जरुरी होगा

हालाँकि अब तक डाक्टरों ने हुकूमत के इस इरादे पर अपना कोइ वीचार जाहिर नही किया है लेकिन आम तौर पर यही कहा जा रहा है कि डाक्टरों को शहरीयों के इलावा देहातों का भी ख़्याल रखना चाहीए ।

हुकूमत ने एम बी बी एस डाक्टर के पोस्ट ग्रेजूएट्स कोर्से में 50 फ़ीसद( प्रतिशत)तहफ़्फुज़ात(रीजर्वेशन‌) की लॉंचिंग की थी और ये उन डाक्टरों के लिए थी जो ग्रेजूएशन के बाद तीन साल तक किसी देहात में खिदमत करने के लिए राजी हों लेकिन वज़ीर-ए-सेहत(स्वास्थ मंत्री) ग़ुलाम नबी आज़ाद ने लोक सभा को जो इत्तेला ( खबर) दी है वो इंतिहाई (बडी हद तक‌) मायूसकुन (निराशा जनक)है ।

उन्होंने बताया कि 50 फ़ीसद( प्रतिशत) तहफ़्फुज़ात(रीजर्वेशन‌) के बावजूद कोई भी डाक्टर देहातों में खिदमत करने के लिए राजी नहीं जिस से ये ज़ाहिर हो जाता है कि डॉक्टरों ने तिब्ब के मुक़द्दस पेशे(इलाज मुआलजे) को वाक़तन(हकिकत में) तिजारत( व्यापार) में तब्दील कर ( बदल)दिया है ।

ग़ुलाम नबी आज़ाद ने बताया कि ऐसे डॉक्टर जो एक साल तक देहातों में खिदमत करेंगे उन्हें 10 ग्रेस मार्क्स दिए जायेंगे ।

इन मुराआत(रीआयतों) के ऐलान के बावजूद ये बात अफ़सोस के साथ कहनी पड़ती है कि कोई भी डाक्टर देहातों में ख़िदमात करने के लीए तैयार नहीं । वो सिर्फ़ पैसों का मुंह देख रहे हैं डॉक्टर ये भूल रहे हैं कि देहातों में काम करने से देहाती लोगों में इन की इज़्ज़त कितनी बढ़ जाती है । लोग डाक्टर बाबू डाक्टर बाबू कहते हुए उन के आगे पीछे घूमते रहते हैं ।

इन का ज़ाती काम भी करने हमेशा तैयार रहते हैं । ग़ुलाम नबी आज़ाद ने मुस्कुराते हुए कहा कि इस का अंदाज़ा उन्होंने मनोज कुमार की पुरानी फ़िल्म हिमालय की गोद में देख कर लगा लिया था ।

कालेज के इब्तिदाई दौर में ( प्रारम्भिक समय) उन्होंने वो फ़िल्म देखी थी और डाक्टर के देहात में ख़िदमात अंजाम देने के जज़बे से बहुत मुतास्सिर (सहमत/प्रभावित) हुए थे । उन्होंने कहा कि डॉक्टर्स ग़रीबों के लिए मसीहा होते हैं अगर वो अपना ऐश-ओ-आराम कुछ अर्सा के लिए तर्क कर दें तो उन्हें कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा लेकिन ऐसा करने से उन की इज़्ज़त‍ ओ‍ एहतेराम में जो इज़ाफ़ा होगा इस का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है।

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