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तलंगाना सिर्फ़ वायदा की नज़र

लोक सभा में तेलंगाना अरकान ने अपने मुतालिबा की ताईद में खुल कर बहस करने के बजाय एहतिजाज और बाईकाट से काम लिया है। बजट सेशन में इलाक़ा की नुमाइंदगी करने वाले तेलंगाना क़ाइदीन ऐवान के अंदर बारी बारी से अपनी बात पेश करने या सिर्फ अपना ए

लोक सभा में तेलंगाना अरकान ने अपने मुतालिबा की ताईद में खुल कर बहस करने के बजाय एहतिजाज और बाईकाट से काम लिया है। बजट सेशन में इलाक़ा की नुमाइंदगी करने वाले तेलंगाना क़ाइदीन ऐवान के अंदर बारी बारी से अपनी बात पेश करने या सिर्फ अपना एहतिजाज दर्ज कराने का फ़र्ज़ अदा कर रहे हैं।

गुज़श्ता चंद दिन क़ब्ल जब तेलंगाना से ताल्लुक़ रखने वाले कांग्रेस के अरकान-ए-पार्लीमेंट ने एहतिजाज किया था तो उस वक़्त दीगर क़ाइदीन चुप रहे। उन्हें मुअत्तल किया गया तो वो नाराज़ होकर ऐवान से दूर हो गए। इन के बाद टी आर एस के क़ाइदीन ने ऐवान में अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाने के लिए तेलंगाना के लिए सदा लगाई।

तेलंगाना का मसला अगर सदा लगाने से हल हो जाता है तो ठीक था मगर यहां मर्कज़ का रवैय्या ज़ाहिर करता है कि वो तेलंगाना पर दोहरे मयार या दोगली पालिसी पर अमल पैरा है। तेलंगाना का दम भरने वाले क़ाइदीन भी हिक्मत, सियासत और मुसालहत से काम ले रहे हैं।

जिन क़ाइदीन ने एक अर्सा तक तेलंगाना और इस के अवाम को अपने सयासी मुफ़ादात की अंधी जंग में उतार कर रोज़गार, मईशत और अमन-ओ-ज़िंदगी को अबतर बनाया था, अब वो पार्लीमेंट की राहदारियों में सिर्फ हाथ बांधे घूमते नज़र आ रहे हैं। मर्कज़ तक पहुंचने वाले क़ाइदीन ने तेलंगाना और इस के अवाम के हक़ में किस हद तक काम किया है ये खुली आँख वाले देख चुके हैं, कुसूर उन लोगों का है ना अवाम का बल्कि इस वक़्त तेलंगाना में जो कुछ हालात हैं या इस मसला को किनारा पर लगा देने में जिन किसी का भी हाथ है उन की नादानियों और ना-अहलियों का कफ़्फ़ारा अवाम को अदा करना पड़ रहा है। बाअज़ क़ाइदीन ऐसे हैं जिन में तेलंगाना के दोस्त कौन हैं दुश्मन कौन हैं फ़र्क़ करना मुश्किल है।

तेलंगाना का दम भरने वाली क़ियादत सिर्फ एक पहलू पर काम करती नज़र आ रही है, वो ये कि रियासत के अवाम को आस में रखा जाए और अपनी तिजोरी भर ली जाए। इस पहलू के हवाले से भी कई इल्ज़ामात आइद किए जा रहे हैं। ज़ाहिर है जब तेलंगाना के हुसूल का वक़्त आ गया था, इस के हक़ में एहतिजाज का असर अपनी आख़िरी हद को पहुंच गया था तो इस को अचानक किस ने कमज़ोर बना दिया, ये कोई पोशीदा बात नहीं है।

मर्कज़ी हुकूमत जिस ने बा क़ायदा ऐलान किया था कि वो तेलंगाना रियासत के क़ियाम के लिए तैयार है, मगर अब यही क़ियादत हीले हवाले से काम ले रही है बल्कि एक वायदा को टालने के लिए दूसरे वायदा का सहारा ले रही है। वज़ीर-ए-दाख़िला पी चिदम़्बरम ने अलैहदा रियासत के लिए लोक सभा में गड़बड़ किए जाने पर कहा है कि वो तेलंगाना मसला पर जल्द जवाब देने तैयार हैं, इन्हें जवाब देना नहीं है बल्कि तेलंगाना रियासत की तशकील के ताल्लुक़ से अपने ऐलान पर अमल करना है।

उन्होंने तेलंगाना से ताल्लुक़ रखने वाले अरकान-ए-पार्लीमेंट से अपील की है कि वो पार्लीमेंट में नज़म-ओ-ज़बत बरक़रार रखें और बजट सेशन की कार्रवाई चलने दें। अपोज़ीशन लीडर सुषमा स्वराज ने जब सवाल किया कि हुकूमत तेलंगाना की तशकील के मुतालिबा का क्या जवाब ढूंढ रही है और क्या क़दम उठा रही है तो चिदम़्बरम ने जल्द से जल्द जवाब देने का वायदा किया।

तेलंगाना मसला पर ऐवान के अंदर और बाहर सिर्फ़ वादों से काम लिया जा रहा है। आम इंतेख़ाबात ( चुनाव) के लिए अभी वक़्त ( समय) है, इस लिए तब तक ब्यानात और वायदे से अवाम को गुमराह रखा जाए। तेलंगाना में मसाएल पैदा करने वाले लोग अपने इलाक़ा में भी ज़िम्नी इंतेख़ाबात का मुक़ाबला करने वाले हैं।

उन्हें वाई एस आर कांग्रेस से ख़तरा है, इसलिए रियासत में कांग्रेस की साख को कमज़ोर होता देख कर वो अलैहदा रियासत तेलंगाना की मुख़ालिफ़त का एक दूसरा बहाना तलाश कर लेंगे। एक मसला पर मुख़्तलिफ़ पार्टीयों की अलैहदा अलैहदा कोशिशें और एहतिजाज ने असल मुतालिबा की शिद्दत को कमज़ोर कर दिया है।

जब कांग्रेस के क़ाइदीन तेलंगाना की आवाज़ उठाते हैं दूसरे चुप रहते हैं और अपनी बारी का इंतेज़ार करते हैं। एहतिजाज और मुतालिबा के दरमयान बारी का इन्तेज़ार किया जाने लगे तो फिर तेलंगाना की तशकील के लिए मर्कज़ पर डाले जाने वाले दबाव में शिद्दत किस तरह पैदा हो सकेगी।

बी जे पी भी ऐवान की हद तक अपना दो लफ़्ज़ी फ़रीज़ा अदा करना चाहती है। लोक सभा में पीर ( सोमवार) के दिन भी जब टी आर एस के अरकान ने अलैहदा रियासत तेलंगाना के हक़ में नारे बुलंद करते हुए कार्रवाई में ख़लल डाला। अलैहदा रियासत की तशकील के उन के मुतालिबा की ऐवान में अपोज़ीशन लीडर सुषमा स्वराज ने ताईद की, ये बात तो दुरुस्त है कि ऐवान में अपोज़ीशन ने ताईद का मौक़िफ़ इख्तेयार किया है मगर वो ये वाज़िह करने से गुरेज़ कर रही है कि तेलंगाना के लिए वो कितना संजीदा है। हक़ीक़ी तब्दीली तो मर्कज़ से ही आती है लेकिन इस की क़ियादत का किरदार वाज़िह नहीं है, इस ने मुल्क के बाशिंदों की फ़िक्र नहीं की तो तेलंगाना के अवाम की मआशी ख़ुशहाली और इज़्तिमाई तौर पर इंसानी वसाएल की तरक़्क़ी के लिए फ़िक्र क्यों करेगी।

तेलंगाना के अवाम उस दिन की तमन्ना कर सकते हैं कि एक दिन उन की भी एक अलैहदा रियासत होगी और मर्कज़ का वायदा पूरा होगा। अगर तेलंगाना रियासत बनाने का वायदा पूरा कर लिया जाए तो मआशी तौर पर तब्दीली के लिए यहां के वसाएल के एतबार से बेहतरी आएगी।

अवाम को यही आस है कि इन की अपनी रियासत में उन्हें रोज़गार, तरक़्क़ी, तालीम और ख़ुशहाली के मौक़े हासिल होंगे। जिन मुलाज़मतों पर आँधराई अफ़राद का ग़लबा है वो कम होगा और उन के हिस्सा का रोज़गार मुकम्मल तौर पर उन्हें हासिल होगा। इस लिए अपने मुतालिबात की यकसूई के लिए मर्कज़ के वादों पर भरोसा करने के बजाय अमली इक़्दामात पर ज़ोर देना चाहीए।

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