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तलबा का मुस्तक़बिल संवारने में वालदैन का अहम रोल

हैदराबाद ।०३ जून (रास्त) इंटरमीडीयेट के बाद ही तलबा-ए-के कैरीयर की मंसूबा बंदी का आग़ाज़ होता ही। यही मरहला सब से अहम और फ़ैसलाकुन साबित होता है और अपने बच्चों के मुस्तक़बिल की मंसूबा बंदी की असल ज़िम्मेदारी अब वालदैन पर आइद होजात

हैदराबाद ।०३ जून (रास्त) इंटरमीडीयेट के बाद ही तलबा-ए-के कैरीयर की मंसूबा बंदी का आग़ाज़ होता ही। यही मरहला सब से अहम और फ़ैसलाकुन साबित होता है और अपने बच्चों के मुस्तक़बिल की मंसूबा बंदी की असल ज़िम्मेदारी अब वालदैन पर आइद होजाती ही। ग्रैजूएशन में दाख़िला तलबा-ए-को एक आज़ादी का एहसास दिलाता हीजबका वो लड़कपन की दहलीज़ पार कर लेता ही। यहीं से इस के ख़्यालात बदलने लगते हैं। यहां कॉलिजस के लकचररस की ज़िम्मेदारी कम हो जाती है।

वो मग़रिब के इस फ़लसफ़ा पर अमल करने लगे हैं कि बच्चा जब बाप के क़द के बराबर होजाता है तो वो दोस्त बन जाता ही। इसी फ़लसफ़ा की वजह से लकचररस अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभाने में कामयाब नहीं रहती। इन ख़्यालात का इज़हार डाक्टर मुहम्मद यूसुफ़ आज़म ने किया। चेयरमैन आज़म डिग्री कॉलिज हुसैनी इलम डाक्टर यूसुफ़ आज़म ने मीडीया के नुमाइंदों से बातचीत करते हुए बताया कि आज कॉलिज के तलबा-ए-और तालिबात जिस बेराह रवी का शिकार हैं, इस की सब से बड़ी वजह कॉलिजस का आज़ादाना माहौल, वालदैन की औलाद से मुताल्लिक़ अदम तवज्जही, लकचररस की फ़राइज़ से ग़फ़लत ही। वालदैन अपने बच्चों को मशहूर कॉलिजस में दाख़िला दिला कर ये समझते हैं कि इन की ज़िम्मेदारी पूरी हो गई।

वो ना तो इस के तालीमी रिकार्ड को देखते हैं, ना ही उन्हें कभी ये जानने की तौफ़ीक़ होती है कि कॉलिज में बच्चे की हाज़िरी का फ़ीसद तनासुब किया ही। वो रोज़ाना कॉलिज जाता है कि नहीं और अगर कॉलिज जाता है तो क्लासेस में शरीक रहता है या नहीं। पढ़ाई में इस की दिलचस्पी किस हद तक ही। किसी ना किसी तरह से डिग्री उसे मिल भी जाती है तो इस की हैसियत काग़ज़ के टुकड़े से ज़्यादा नहीं होती क्योंकि आज के मसह बिकती दौर में डिग्री के साथ साथ शख़्सी क़ाबिलीयत, कमीवनकीशन अस्क़लस में महारत की ज़्यादा एहमीयत है।

डाक्टर यूसुफ़ आज़म ने बताया कि इन की ज़ेर-ए-निगरानी क़ायम आज़म डिग्री कॉलिज में तालीम के हुसूल को बामक़सद बनाने के तमाम तरीक़े इख़तियार किए गए हैं। सब से पहले तालीम के लिए साज़गार इस्लामी माहौल फ़राहम किया गया ही, जहां तलबा-ए-को ये एहसास दिलाया जाता है कि आला तालीम हासिल करने का मक़सद किया ही। वो किस तरह से सिर्फ वालदैन के ही नहीं मलिक और क़ौम की उम्मीदों के महवर हैं।

इन के अख़लाक़ और किरदार का मुआशरा पर क्या असर मुरत्तिब होता ही। डाक्टर यूसुफ़ आज़म ने बताया कि आज़म डिग्री कॉलिज पुराने शहर हैदराबाद के हुसैनी इलम इलाक़ा में वसीअ-ओ-अरीज़ इमारत में क़ायम किया गया ही। बी काम जनरल और बी काम कंप्यूटर्स के इलावा बी एससी कोर्सेस में बेहतरीन एकेडेमिक फैकल्टी फ़राहम की गई ही। हर एक फ़्लोर पर क्लोज़ सर्किट कैमरे नसब किए गए हैं ताकि तलबा-ए-के इलावा असातिज़ा पर भी नज़र रखी जा सके ।

तलबा-ए-और तालिबात के लिए सैक्शन भी अलहदा हैं और औक़ात भी। स्कार्फ़ तालिबात के लिए लाज़िमी रखा गया ही। डाक्टर यूसुफ़ आज़म ने बताया कि आज़म डिग्री कॉलिज, आज़म वोकेशनल ऐंड जूनियर कॉलिज इस्लामी माहौल, इक़दार और रवायात के साथ क़ायम किए गए हैं। इस का एक ही मक़सद है पुराने शहर के तलबा-ए-को कफ़ाएती बल्कि बराए नाम फ़ीस पर आला मयारी तालीम फ़राहम करना ही। मज़ीद तफ़सीलात के लिए ऐडमिनिस्ट्रेटर नदीम से 8096143890 पर रब्त पैदा किया जा सकता है।

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