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तालीम की अलख जगा रही रजिया को पहला मलाला अवार्ड

नई दिल्ली, 12 जुलाई: अपने मासूम हाथों से मेरठ की रजिया ने ऐसे दस्तखत किए कि उसे अकवाम ए मुत्तहिदा ने तालीमी दुनिया के सुल्तान का तमगा दे दिया। ज़िंदगी ने उसे एक मौका दिया तो अपने जज्बे से उसने न सिर्फ अपनी ज़िदगी को रोशन किया बल्कि उन द

नई दिल्ली, 12 जुलाई: अपने मासूम हाथों से मेरठ की रजिया ने ऐसे दस्तखत किए कि उसे अकवाम ए मुत्तहिदा ने तालीमी दुनिया के सुल्तान का तमगा दे दिया। ज़िंदगी ने उसे एक मौका दिया तो अपने जज्बे से उसने न सिर्फ अपनी ज़िदगी को रोशन किया बल्कि उन दर्जनों बच्चों की अंगुलियों में कलम पकड़ा दी जो कुछ वक्त के बाद शायद कलम थामने के लायक भी न बचते।

रजिया के इस दिलेरी को अकवाम ए मुत्तहिदा ने भी माना और अब वह हिंदुस्तान की ‘मलाला’ है। तालीम की खातिर तालिबान के सामने खड़ी होने वाली पाकिस्तान की बहादुर लड़की मलाला यूसुफजई आज यानी 12 जुलाई को 16 साल की हो रही है। अकवाम ए मुत्तहिदा में ‘मलाला-डे’ के मौके पर शामिल होने के लिए रजिया न्यूयॉर्क नहीं जा पाईगी।

लेकिन, पहला मलाला अवार्ड हिंदुस्तान की 15 साल की रजिया को ही दिया जाएगा। अकवाम ए मुत्तहिदा के जनरल सेक्रेटरी के खुसुसी सफीर गार्डन ब्राउन ने रजिया को खत लिखकर बताया है कि वह अपनी जुबानी पूरी दुनिया को रजिया की कहानी सुनाएंगे।

बदलाव की यह कहानी तब शुरू हुई जब रजिया महज पांच साल की थी। मेरठ के नांगली कुंबा गांव में बचपन फुटबाल की सिलाई कर खानदान को सहारा देने में जुटा हुआ था। फुटबाल की सिलाई में बच्चों को इसलिए लगाया जाता है क्योंकि उनकी नाजुक अंगुलियां जितनी बारीक सिलाई करती हैं, उतनी बड़े नहीं कर पाते।

लेकिन, कई मामलों में देखा गया है कि कुछ साल तक काम करते-करते बच्चों की अंगुलियां टेढ़ी हो जाती हैं। गैर सरकारी तंज़ीम ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ ने रजिया का बचपन आजाद कराने की कोशिश की। उसके घर वालों से बात की और उन्हें समझाया, जिससे रजिया मजदूरी से आजाद हो गई।

तालीम की रोशनी और अपने जज्बे से उसने आस-पास के गांवों तक रोशनी फैलाई। अब तक उसने 46 बच्चों को बाल मजदूरी से अजाद कराकर स्कूल में दाखिला दिलाया है। उसने खुद कुराली के एसडीआर स्कूल से 11वीं पास कर ली है। अब वहां बच्चों से मजदूरी नहीं कराई जाती। एतेमाद से भरी रजिया ने रोजनामा अखबार ‘दैनिक जागरण’ से बातचीत में कहा कि वह आगे भी समाज सेवा ही करना चाहती है।

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