Friday , December 15 2017

तीन किस्म के आमालनामे

‘‘हजरत आयशा (रजि०) का बयान है कि अल्लाह के रसूल (स०अ०व०) ने इरशाद फरमाया- आमालनामे तीन किस्म के होंगे। एक वह आमाल नामा होगा जिसको अल्लाह हरगिज माफ नहीं करेगा। यह अल्लाह के साथ शिर्क है। अल्लाह तआला का फरमान है- बेशक अल्लाह शिर्क को हर

‘‘हजरत आयशा (रजि०) का बयान है कि अल्लाह के रसूल (स०अ०व०) ने इरशाद फरमाया- आमालनामे तीन किस्म के होंगे। एक वह आमाल नामा होगा जिसको अल्लाह हरगिज माफ नहीं करेगा। यह अल्लाह के साथ शिर्क है। अल्लाह तआला का फरमान है- बेशक अल्लाह शिर्क को हरगिज माफ नहीं करेगा। दूसरे में वह आमाल दर्ज होंगे जो बंदो ने आपस में एक दूसरे के साथ ज्यादती की शक्ल में किए होंगे। उसको अल्लाह हरगिज न छोड़ेगा। यहां तक कि बंदे एक दूसरे से अपना बदला ले लें। तीसरे में वह आमाल दर्ज होंगे जिनका ताल्लुक खुदा और बंदो से है। यह अल्लाह के हवाले है जिसे चाहेगा अजाब देगा और जिसे चाहेगा माफ करेगा।’’ (मिश्कात बहवाला बेहकी)

इस हदीस में तीन किस्म के आमाल नामो का जिक्र किया गया है। जिनमें से दो का ताल्लुक खुदा से और एक का ताल्लुक बंदो से है। पहली किस्म में वह आमाल होंगे जिनका ताल्लुक खुदा की जात व सिफात से होगा। जिसको अल्लाह हरगिज माफ न करेगा। अल्लाह के यहां शिर्क ही की बख्शिश नहीं। अल्लाह तआला का इरशाद है -‘‘जिसने अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराया वह तो गुमराही में बहुत दूर निकल गया।’’

कुरआन मजीद में तकरीबन चार सौ बत्तीस (432) मकामात पर शिर्क, इसकी हकीकत, इसकी मजम्मत, मुशरिकाना फेअल, आमाल, कौल और इसके अंजाम का जिक्र किया गया है, जिससे शिर्क की शिद्दत को महसूस किया जा सकता है। सूरा इनाम आयत (151) एक सौ इक्यावन में इरशाद है- उसके साथ किसी को शरीक न करो। जिसकी तशरीह करते हुए मौलाना मौदूदी ने लिखा है कि खुदा की जात में किसी को उसका शरीक न ठहराओ, न उसकी सिफात में न उसके अख्तियारात और न उसके हुकूक में।

जात में शिर्क यह है कि जौहर अलवहियत में किसी को हिस्सेदार करार दिया जाए। यानी फरिश्तों को बेटियां, देवी देवता मानना वगैरह। सिफात में शिर्क यह है कि खुदाई सिफात जैसी कि वह खुदा के लिए है, वैसा ही उनको या उनसे किसी सिफत को दूसरे के लिए करार दिया। यानी गैब का हाल जानने वाला, किस्मत का बनाने वाला समझना। इख्तेयारात/अख्तियारात में शिर्क यह है कि खुदा होने की हैसियत से जो इख्तेयारात सिर्फ अल्लाह के लिए मखसूस हैं उनको या उनमें से किसी को अल्लाह के सिवा किसी और के लिए तस्लीम किया जाए। यानी नफा-नुक्सान, हाजत रवाई, दुआएं सुनना, हराम व हलाल, जायज व नाजायज की हद मुकर्रर करना, कानून व शरीअत तजवीज वगैरह सब अल्लाह तआला के मखसूस इख्तेयारात हैं जिनमें से किसी को गैरूल्लाह के लिए तस्लीम करना शिर्क है।

हुकूक में शिर्क यह है कि खुदा होने की हैसियत से बंदो पर खुदा के जो मखसूस हुकूक हैं वह या उनमें से कोई अल्लाह तआला के सिवा किसी और के लिए माना जाए। मसलन रूकूअ, सजदा, शुक्रे नेमत या एतराफे बरतरी के लिए राज व नियाज, मुसायब व मुश्किलात में पुकारा जाना और उसी में परस्तिश व ताजीम व तमजीद की दूसरी तमाम सूरते अल्लाह के मखसूस हुकूक हैं और यह भी अल्लाह ही का हक है कि उसकी गैर मशरूत इताअत की जाए और उसकी हिदायत को सही व गलत का मेयार माना जाए और किसी ऐसी इताअत का हलका अपनी गर्दन में न डाला जाए जो अल्लाह की इताअत से आजाद एक मुस्तकिल इताअत हो और जिसके हुक्म के लिए अल्लाह के हुक्म की सनद न हो।

उन हुकूक में से जो हक भी दूसरों को दिया जाएगा वह अल्लाह का शरीक ठहरेगा चाहे उसको खुदाई नामों से कोई नाम दिया जाए या न दिया जाए।

तीसरी किस्म में वह आमाल है जिन का ताल्लुक खुदा और बंदो से है। यह अल्लाह के हवाले से है जिसे चाहेगा अजाब देगा और जिसे चाहेगा माफ करेगा। इसका ताल्लुक अकायद से नहीं बल्कि आमाल व इबादात से है। यानी बंदो की नमाज, रोजा वगैरह में अगर कोताही हो जाए तो वह जो माफ करने वाला है जानने वाला है और हिकमत वाला है, आदिल व मुंसिफ है बंदो की नीयतों, इरादों जज्बात व एहसासात से बखूबी वाकफियत रखता है, बेहतर जानता है कि कौन माफ कर देने के लायक है कौन सजा के लायक।

खुद अल्लाह तआला का सूरा अलनिसा में इरशाद है-
‘‘ और वह शिर्क के इलावा सारे गुनाह माफ कर देगा जिसके गुनाह माफ करना चाहे।’’
रिवायत में है कि हजरत अबू बक्र (रजि०) ने कहा अगर यौमे जजा पर कोई पुकारने वाला कहे कि सब जन्नत में दाखिल हो गए सिवाए एक के तो मैं समझूंगा कि वह एक मैं हूँ और अगर पुकारने वाला कहे कि सब दोजख में दाखिल होंगे सिवाए एक के तो मैं समझूंगा कि वह एक मैं हूं।

एक मोमिन को इसी उम्मीद, नाउम्मीदी, खौफ व डर और खौफ व मोहब्बत की इसी कैफियत के साथ नेक आमाल करते हुए जिंदगी गुजारनी चाहिए।

दूसरी किस्म के आमाल वह है जिनका ताल्लुक सीधे खुदा के बंदो से यानी इंसानों से है। खुदा उन्हें माफ नहीं करेगा। बंदो के हुकूक का फहम व इदराक और उन्हें अदा करने का एहसास आम तौर पर नहीं पाया जाता। मैदाने हश्र में जबकि नफ्सा-नफ्सी का आलम होगा आदमी अपने करीब तरीन रिश्तेदार, दोस्त व अकारिब से मांगेगा, जान कर भी अनजान हो जाएगा, हर किसी को फिक्र होगी कि किसी तरह आमाल नामा उसके सीधे हाथ में दिया जाए, नेकियों का पलड़ा भारी हो तो उस वक्त भला कोई किसी को क्यों माफ करेगा बल्कि उसकी कोशिश तो यही होगी कि किसी तरह कहीं से कुछ और नेकियां मिल जाएं और वह निजात पा जाए।

सच्चे मुसलमान की यही ख्वाहिश होती है कि वह आखिरत के दिन सुर्खरू हो। उसके लिए इसके सिवा कोई रास्ता नहीं कि खुदा के हुकूक के साथ बंदो के हुकूक भी अदा किए जाएं। वह इन तमाम रिश्तों के हुकूक अदा करने की कोशिश करे जिसकी तरतीब भी इस्लाम ने वाजेह कर दी है। यानी वाल्दैन, जौजैन, औलाद, अजीज व अकारिब। जो ज्यादा करीबी ताल्लुक रखता है वह इस बात का ज्यादा हकदार है कि उसके हुकूक अदा किए जाएं।

इरशाद है- ‘‘और तेरे रब ने फैसला कर दिया है कि तुम लोग किसी की इबादत न करो मगर सिर्फ उसकी और वाल्दैन के साथ नेक सुलूक करो।’’ (बानी इस्राईल-43)

नेक सुलूक में किफालत के साथ-साथ इज्जत व एहतराम अदब व ताजीम, इताअत व फरमांबरदारी, राजजूई, खुश अखलाकी, खिदमत व मोहब्बत वगैरह सब दाखिल है। हजरत अबू उमामा (रजि०) फरमाते हैं। एक शख्स ने नबी करीम (स०अ०व०) से पूछा या रसूल (स०अ०व० )! मां बाप का औलाद पर क्या हक है? आप (स०अ०व०) ने इरशाद फरमाया-‘‘ मां-बाप ही तुम्हारी जन्नत व दोजख है।’’ (इब्ने माजा) अल्लाह तआला का इरशाद है-‘‘ अगर इनमें से एक या दोनों तुम्हारें सामने बुढ़ापे की उम्र को पहुंच जाए तो तुम उनको उफ तक न कहो, न उन्हें झिड़कियां दो।’’ मजीद इरशाद है-‘‘ और उनसे एहतराम से बात कीजिए।’’ (बनी इस्राईल-43) और आजिजी और नर्मी से उनके सामने बिछे रहो। (हमने वसीयत की कि) मेरा शुक्र अदा करो और अपने मां-बाप के शुक्र गुजार रहो। और दुआ करो कि यह परवरदिगार इन दोनों पर रहम फरमा जिस तरह इन दोनों ने बचपन मे परवरिश फरमाई थी।

और हुक्म है- परवरदिगार! मेरी मगफिरत फरमा और मेरे वाल्दैन की और सब ईमान वालों को उस दिन माफ कर दे जबकि हिसाब कायम हो।

जोजैन के दूसरे पर जो हुकूक है उनमें से पहली चीज यह है कि अल्लाह तआला ने वह (औरतें) तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास हो कहकर जो जिम्मेदारियां डाली है उन्हें अच्छी तरह समझने और अदा करने की जरूरत है। सूरा निसा आयत‍ (34) चौतीस में वजाहत के साथ इरशाद है- मर्द औरतों पर कव्वाम है इस बिना पर कि अल्लाह ने उनमें से एक को दूसरे पर फजीलत दी है और इस बिना पर कि मर्द अपने माल खर्च करते हैं, पस जो नेक औरतें हैं वह इताअत शिआर होती हैं और मदों के पीछे अल्लाह की हिफाजत व निगरानी में उनके हुकूक की हिफाजत करती है ।

सूरा बकरा आयत (228) दो सौ अट्ठाइस में फरमाया गया- औरतों के लिए भी मारूफ तरीके पर वैसे ही हुकूक है जैसे मर्दों के हुकूक उनपर है। अलबत्ता मर्दों को उन पर एक दर्जा हासिल है और अल्लाह गालिब इक्तेदार रखने वाला और दाना है। हज्जतुल विदा के मौके पर सहाबा की बड़ी तादाद से मुखातिब होकर नबी करीम (स०अ०व०) ने इरशाद फरमाया- लोगों! सुनो, औरतों के साथ अच्छे सुलूक से पेश आओ क्योंकि वह तुम्हारे पास कैदियों की तरह है, तुम्हें उनके साथ सख्ती का बरताव करने का कोई हक नहीं सिवाए उस सूरत में कि जब उनकी तरफ से खुली हुई नाफरमानी सामने आए।

अगर वह ऐसा कर बैठे तो फिर ख्वाब गाहों में उनसे अलग रहो और उन्हें मारो और ऐसा न मारना कि कोई शदीद चोट आए। और फिर जब वह तुम्हारे कहने पर चलने लगे तो उनको बिला वजह सताने के बहाने न ढूंढो। देखो सुनो! तुम्हारे कुछ हुकूक तुम्हारी बीवियों पर हैं और तुम्हारी बीवियों के कुछ हुकूक तुम्हारे ऊपर है। उनपर तुम्हारा हक यह है कि वह तुम्हारे बिस्तरों को उन लोगों से न रौंदे जिनको तुम नापसंद करते हो और तुम्हारे घर में ऐसे लोगों को हरगिज न घुसने दें जिन का आना तुम्हें नागवार हो और सुनो उनका तुम पर यह हक है कि उन्हें अच्छा खिलाओ और अच्छा पहनाओ।

मर्द को जहां अल्लाह ने एक से ज्यादा बीवी यानी चार तक की इजाजत दी है वही अदल व इंसान की कड़ी शर्त रखी है। हजरत अबू हुरैरा (रजि०) से मरवी है कि नबी करीम (स०अ०व०) ने फरमाया कि जिस शख्स की दो बीवियां हो और वह दोनों में से एक की तरफ झुके (और उसके हुकूक अदा करें और उसके मुकाबले में दूसरी के हुकूक अदा न करे) तो वह कयामत के दिन इस हाल में आएगा कि उसका आधा धड़ अलग होगा। (अबू दाऊद) आप (स०अ०व०) ने यह करके गोया मुहर लगा दी कि मोमिनों में कामिल ईमान वाला वह है जिसका अखलाक अच्छा हो और तुम में सबसे ज्यादा अच्छे वह हैं जो अपनी औरतों के लिए अच्छे है। (तिरमिजी)

औलाद के बारे में नबी करीम (स०अ०व०) का इरशाद है बाप अपनी औलाद को जो कुछ दे सकता है उसमें बेहतरीन अतिया औलाद की अच्छी तालीम व तर्बियत है। (बेहिकी) हजरत अब्बास (रजि०) से मरवी है कि नबी करीम (स०अ०व० ) ने फरमाया कि बाप पर बच्चे का यह हक है कि उसका अच्छा नाम रखे और उसे हुस्ने अदब से आरास्ता करे और जब वह बालिग हो जाए तो उसकी शादी कर दे।

अगर (बच्चा) बालिग हो गया मगर (बाप ने) उसकी शादी न की और (नतीजा यह हुआ कि) वह हराम काम में मुब्तला हो गया तो उसका बाप उस गुनाह का जिम्मेदार होगा। और फरमाया कि जिस शख्स की बेटी हो फिर न तो वह उसे जिंदा दफन करे और न अपने बेटे को उस पर तरजीह दे तो अल्लाह उसे जन्नत में दाखिल करेगा। (अबू दाऊद) सूरा अस्सफ में अल्लाह का इरशाद है-‘‘ ऐ ईमान वालों बचाओ अपने आप को और अपने अहल को दोजख की आग से। यानी अहले ईमान की यह जिम्मेदारी है कि खुदा और रसूल के एहकामात से वाकिफ हो और उनपर अमल करे और अपने अहल व अयाल को भी अल्लाह और उसके रसूल की इताअत पर आमादा करे ताकि वह जहन्नुम के इंधन बनने से बचें।

रिश्तेदारों के हुकूक से मुताल्लिक सूरा निसा की पहली आयत में इरशाद है- उस खुदा से डरो जिसका वास्ता देकर तुम एक दूसरे से अपना हक मांगते हो। और रिश्ते और कराबत के ताल्लुकात को बिगाड़ने से परहेज करो। सूरा रोम में अल्लाह का इरशाद है- पस ऐ मोमिन रिश्तेदार को उसका हक दे और मिसकीन व मुसाफिर को उसका हक। यह तरीका बेहतर है उन लोगों के लिए जो खुदा की खुशनूदी चाहते हैं।

सूरा नमल में इरशाद है-‘‘अल्लाह हुक्म देता है अदल, एहसान और रिश्तेदारों को देने का।’’ इस मुख्तसर सी आयत में तीन ऐसी चीजों अदल, एहसान और सिला रहमी का हुक्म है, जिनपर पूरे समाज का इंहिसार है। यानी इतना ही नहीं कि आदमी रिश्तेदारों के साथ अच्छा बरताव करे, सुख और गम में साथ दे बल्कि अपने माल में रिश्तेदारों के हक को तस्लीम करे। कई कुरआनी आयतों और अहादीस से न सिर्फ रिश्तेदारों के हुकूक की वजाहत होती है बल्कि वह तमाम अफराद जिनका एक दूसरे से रब्त व ताल्लुक होता है, यानी पड़ोसी, मुसाफिर, आका खादिम, दोस्त अहबाब वगैरह सब पर इंसान के कुछ न कछ हुकूक वाजिब होते हैं।

जिनकी तरफ से गफलत, कोताही या जुल्म के नतीजे में वह घाटे में मुब्तिला होगा। आज मिल्लत का बड़ा हलका जहां शिर्क व बिदअत व खुराफात से अपने आप को और मआशरे को बचाने में लगा हुआ है और साथ ही साथ नेक आमाल में सबकत करने की भी कोशिश में लगा हुआ है वही मिल्लत की अक्सरियत बंदो के हुकूक की तरफ से गफलत बरत रही है। यह नहीं कि वह वाल्दैन, जौजैन, औलाद, रिश्तेदार, दोस्त-अहबाब, पड़ोस व मुलाजमीन के हुकूक नहीं जानती। जानती तो है लेकिन उनकी पूरी तरह अदायगी मे रूकावट कभी उसकी माद्दापरस्ती, नफ्स परस्ती, ऐशकोशी, काहिली और गफलत बनती है तो कहीं उसकी रिश्तेदारी दूसरे रिश्तेदारों के हुकूक की अदाएगी में रूकावट बनती है। बहुत कम ऐसे लोग मिलेंगे जो एक साथ सबके हुकूक अदा करते हों या जिन से एक साथ तमाम रिश्तेदार, दोस्त व अहबाब मुत्मईन और खुश हों।

उम्मते मुस्लेमा का यह पहलू काबिले गौर है। बंदो के हुकूक की अहमियत का अंदाजा इस हदीस से बखूबी लगाया जा सकता है। हजरत अबू हुरैरा (रजि०) से रिवायत है कि नबी करीम (स००व०) ने फरमाया- क्या तुम जानते हो कि मुफलिस कौन है? सहाबा (रजि०) ने अर्ज किया कि या रसूल (स००व०)हमारे यहां तो मुफलिस वह होता है जिसके पास न रूपया पैसा हो न साज व सामान। नबी करीम (स०‍अ०व० ) ने फरमाया- मेरी उम्मत में मुफलिस वह है जो कयामत के दिन नमाज रोजा और जकात लेकर आएगा मगर इस हालत में रहेगा कि किसी को गाली दी होगी, किसी पर तोहमत लगाई होगी, किसी का माल खाया होगा, और किसी का खून बहाया होगा और किसी को मारा होगा फिर वह बैठेगा। और उसकी कुछ नेकियां उसके मजालिम के कसास के तौर पर (एक मजलूम) ले लेगा और कुछ दूसरा (मजलूम) ले लेगा। फिर अगर उसकी नेकियां उसकी खताओं का कसास अदा करने से पहले ही खत्म हो गई तो फिर उसके मजलूमों की खताएं ले ली जाएंगी और उस (जालिम) पर डाल दी जाएगी और फिर उसे दोजख में डाल दिया जाएगा। (तिरमिजी) यकीनन कोई अक्लमंद नहीं चाहेगा कि उसकी कमाई हुई नेकियां दूसरो की झोली में और दूसरे के गुनाह उसकी झोली में डाल दिए जाएं।

तो उसे चाहिए कि अल्लाह के हुकूक के साथ-साथ बंदो के मामले में भी मुमताज जिंदगी गुजारे। अल्लाह तआला से दुआ है कि वह अल्लाह और बंदो के हुकूक अच्छे तरीके से और बेरगबत अदा करने की तौफीक अता फरमाएं-आमीन (‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍खुर्शीद फरजाना)

बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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