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तीन तलाक़ पर विवाद: ज़किया ज़ाफ़री, बिल्क़िस बानो और ईशरत जहां का क्या?

तीन तलाक़ पर विवाद: ज़किया ज़ाफ़री, बिल्क़िस बानो और ईशरत जहां का क्या?जहाँ मुस्लिम पर्सनल लॉ के समापन का विवाद अपने चरम पर है, वहीं सरकार मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक़ और बहुविवाह से सुरक्षा की अपनी इच्छा पर खासा जोर दे रही है। ऐसे में यह गौर करना प्रासंगिक होगा की केंद्र की सत्ताधारी पार्टी सिर्फ महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में ही असफल नहीं रही है बल्कि पहले भी महिलाओं के इन्ही अधिकारों का हनन करती आई है।

2002 के गुजरात दंगे में जब भाजपा प्रदेश की सत्ता में थी तब वहां पर संविधान द्वारा हर एक नागरिक को प्राप्त जीवन के अधिकार का बढ़ चढ़ कर हनन किया गया था। दंगे में हज़ारों की संख्या में मुस्लिम महिलाओं के साथ रेप किया गया और उनकी हत्या कर दी गयी।मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अधिकारीयों को आदेश दिया गया था की, हिंदुओं को अपना गुस्सा निकालने दिया जाए।

यह बताने की ज़रूरत नहीं है की मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ इस घिनौने अपराध के दोषियों पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। ज़किया जाफरी उन मुस्लिम महिलाओं में से हैं जिनके पति एहसान जाफ़री को 2002 के दंगे में गुलबर्ग सोसाइटी में दंगाइयों ने बेदर्दी से जला कर मार दिया था। जो लोग आज मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात कर रहे हैं उनके ख़िलाफ़ ज़किया जाफ़री 14 सालों तक हक़ की लड़ाई लड़ती रही लेकिन उन्हें अब तक कोई इन्साफ नहीं मिला है।

हाल में हुए दादरी कांड को देख लिया जाए तो अख़लाक़ की माँ, पत्नी और बेटी पर एक साल पहले गौमांस पकाने खाने की अफवाह फैला कर उन पर लांछन लगाया गया। उनके शांति से जीवन यापन करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। जब की वहीं पर अख़लाक़ की हत्या के दोषी में से एक की बुखार से मृत्यु होने पर उसे तिरंगे में लपेट कर शहीद की उपाधि दे दी गयी।

ठीक इसी तरह हरयाणा के मेवात में गौरक्षा के नाम पर दो महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या को प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा एक साधारण घटना बता दी गयी। क्या मनमाना तलाक़ और बहुविवाह जैसे मुद्दे बलात्कार और हत्या जैसे मुद्दों से ज़्यादा गम्भीर हैं१

जहाँ तीन तलाक़ और बहुविवाह से प्रभावित मुस्लिम महिलाओं की संख्या बहुत कम है, वहीं रेप पीड़ित महिलाओं की संख्या ज़्यादा होने पर भी सरकार असंवेदनशील है। अगर कोई मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा की बात करता है तो उसको हाशिमपुरा, गुजरात, निल्ली और मुज्ज़फरनगर के दंगों की पीड़िता माँ, बहन, बेटी, पत्नी से शुरू करना चाहिए और जिनके पतियों की गौरक्षा के नाम पर हत्या कर दी गयी, उनकी सुरक्षा के लिए सामने आना चाहिए।

सभी मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के हनन को देखते हुए हम पाते हैं की यह सामान नागरिक सहिंता को लागू करना और पर्सनल लॉ का समापन करने जैसे मुद्दों का मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसा माना जा सकता है इसका सम्बन्ध धर्म से है। सरकार तीन तलाक़ और बहुविवाह के खिलाफ हो कर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा करना चाहती है लेकिन ज़किया ज़ाफ़री, बिल्क़िस बानो और ईशरत जहां का क्या?

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