तुम्हे जान प्यारी है या पैसे प्यारे हैं ?

तुम्हे जान प्यारी है या पैसे प्यारे हैं ?

केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए नए मोटर वाहन अधिनियम को लेकर देश में विचित्र विवाद चल पड़ा है। इस अधिनियम को लाने का श्रेय केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी को है। केंद्र में भाजपा की सरकार है लेकिन इसी पार्टी की कुछ प्रांतीय सरकारों ने इस अधिनियम को लागू करने से मना कर दिया है।

इस नए अधिनियम के मुताबिक यातायात नियमों का उल्लंघन करनेवालों पर जुर्माने की राशि दस गुनी कर दी गई है। लायसेंस के बिना कार-चालन, नशे में वाहन-चालन, हेलमेट और सीट बेल्ट नहीं लगाना, सिग्नल की परवाह न करना, वाहन बहुत तेज चलाना, ट्रकों में सीमा से ज्यादा माल भरना आदि उल्लंघनों के लिए 10,000 रु. तक का जुर्माना और सजा का प्रावधान भी इस नए कानून में है।

इतने सख्त प्रावधान इसीलिए रखे गए हैं कि यातायात नियमों का जितना भयंकर उल्लंघन भारत में होता है, दुनिया के बहुत कम देशों में होता है। करोड़ों लोग बिना लायसेंस या फर्जी लायसेंस लेकर कार चलाते हैं। शराब के नशे में धुत्त होकर भी अंधाधुंध चलाते हैं।

हर साल लाखों दुर्घटनाएं होती हैं।  इसी प्रवृत्ति को रोकने या घटाने के लिए गडकरी ने इतना सख्त कानून बनवाया है लेकिन इसका उद्देश्य सरकारी खजानों को भरना नहीं है। देश के लोगों को यह तय करना है कि उन्हें अपनी जान प्यारी है या पैसे प्यारे हैं। इस नए कानून का पिछले डेढ़ दो हफ्तों में ही जबर्दस्त असर हुआ है। सड़क-दुर्घटनाओं की संख्या घटी हैं और लाइसेंस बनवानेवालों की संख्या तिगुनी-चौगुनी हो गई है।

दिल्ली में 15 हजार की बजाय 45 हजार लोग लायसेंस-दफ्तरों पर रोज भीड़ लगाए हुए हैं। अब सड़क के सिग्नलों पर भी कार-चालक विशेष ध्यान देने लगे हैं। मालिकों ने अपने ड्राइवरों को कह दिया है कि सिग्नलों का उल्लंघन करोगे तो जुर्माना तुमको भरना पड़ेगा। यह डर अगर कुछ माह भी बना रहे तो देश के यातायात की दशा में बहुत सुधार हो सकता है।

इसके लिए देश गडकरी का आभारी रहेगा लेकिन यह होना नहीं है, क्योंकि प्रांतों की कांग्रेसी सरकारों ने ही नहीं, कई भाजपा सरकारों ने भी इस नए अधिनियम के विरुद्ध खम ठोक दिए हैं। ऐसे में गडकरी क्या करेंगे ? वे भी राज्यों को कह रहे हैं कि आपको जो करना है सो करें। बीमारी गंभीर है और दवा कड़वी है। आपको पसंद नहीं है तो आप मीठी गोली खाइए और मस्त रहिए।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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