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तुर्की में तख्तापलट की कोशिश और इतिहास पर एक नज़र

नई दिल्ली। आज जिस मॉडर्न तुर्की को हम देख रहे हैं उसकी खोज लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद और हार्डलाइन धर्मनिरपेक्षता के प्रति समर्पण भाव रखने वाले एक पूर्व सैन्य अधिकारी मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने की थी। तुर्की सेना खुद को आज भी केमालिज़म के नाम से प्रसिद्ध इस विचारधारा के संरक्षक के रूप में ही देखती है।

1960 से अब तक 4 बार सेना ने अराजकता और इस्लामवाद से तुर्की के लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर तुर्की सरकार का तख्ता पलट किया है। लेकिन हर बार सेना ने देश को लोकतांत्रिक व्यवस्था वापस की। एक उदारवादी इस्लामी पार्टी एकेपी के नेता एरडोगन को तुर्की लोकतंत्र के लिए एक खतरे के रूप में देखा जाता रहा है। एरडोगन ने तुर्की में प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात किए। उन्होंने अपने हाथों में सत्ता को मजबूती देने के लिए कई संवैधानिक परिवर्तन भी किए।

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