तो क्या ओवैसी को मुसलमान अब वोट कटवा के तौर पर देख रहे हैं?

तो क्या ओवैसी को मुसलमान अब वोट कटवा के तौर पर देख रहे हैं?
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नांदेड़ महानगर पालिका चुनाव में जो परिणाम आये हैं, उसकी चर्चा पुरे देश में हो रही है।देश में एक तरफ़ कांग्रेस की वापसी के तौर पर देखे जा रहे हैं वहीं बीजेपी के लिए एक संदेश के तौर पर देख रहे हैं।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि ओवैसी की जो पार्टी 2012 की चुनाव में 11 सीटें जीतकर सनसनी फैला दी थी, वो अब कहीं गायब दिख रही है। लोगों का मानना है कि ओवैसी की राजनीतिक सफर लगभग खत्म हो गई है। कम से कम पुरे देश में जो राजनीतिक फैलाव की सोच थी वो अब कहीं खत्म होती दिख रही है।

भारत के मुसलमान अब ओवैसी को वोट कटवा के तौर पर देख रहे हैं। वजह भी खास है। भारत के मुसलमान शुरु से सेकुलर सोच के रहे हैं और वह किसी साम्प्रदायिक ताकतों को वोट नहीं करते हैं। इसके सबूत के तौर पर भारत पाक बंटवारा की इतिहास में देख सकते हैं। जो हिन्दू मुस्लिम समाज की सोच रखते थे वो पाकिस्तान जाना पसंद नहीं किया। वो इस समाज को ही पसंद करके यहीं रहना पसंद किये।

नांदेड परिणाम आने के बाद हमने कुछ मुस्लिम समाज के विद्वानों से बात करके जानने की कोशिश की है। उनका मानना है कि ओवैसी अब सिर्फ वोट कटवा की पार्टी बन कर रह गयी है। यह संकेत बिहार विधानसभा चुनाव में मुसलमानों ने दे दिया था। नांदेड़ की चुनाव में कांग्रेस के 24 मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत इसलिए हुई क्योंकि मुसलमानों ने एकता दिखाई, उन्होने अपने वोट को बटने नहीं दिया। यही वजह रही कि ओवैसी को एक सीट भी हासिल नहीं हो पाई।

नांदेड की चुनाव में कांग्रेस के सभी 24 उम्मीदवारों के जीतने के पीछे लोग मुस्लिम वोटरों की एकता बताई है। इस चुनाव में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए बड़ी चुनौती थी। जीतना इतना आसान नहीं था। अगर मुस्लिम वोटरों ने एकता नहीं दिखाई होती तो शायद मुमकिन नहीं हो पाता।

2012 में हुए चुनाव में यहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी जरूर रही थी, मगर ओवैसी की पार्टी ने यहाँ राजनीति बदल कर रख दी थी। ओवैसी के 11 उम्मीदवारों ने जीत हासिल करके भारतीय राजनीति में सनसनी फैला दी थी।

जानकारों की मानें तो भारत के मुसलमान अब राजनीति की अच्छी समझ रखने लगे हैं, वे किसी भी ऐसे पार्टी को वोट नहीं देना चाहते है, जो समाज को बांटने का काम करते हैं।

इसकी मिसाल बिहार के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों ने दे दिए थे। ओवैसी की पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव में एक भी खाता नहीं खोल सकी थी। यहीं से ओवैसी की पार्टी की राजनितिक पतन शुरू हो गया था।

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