Wednesday , December 13 2017

तौबा‍ ओर इस्तिग्फ़ार के फ़वाइद-ओ-समरात

सब हमद-ओ-सताइश अल्लाह रब उल आलमीन के लिए है। कायनात के ख़ालिक़-ओ-मालिक अल्लाह ताला के नाज़िल कर्दा दीन में जहां उखरवी मुआमलात में रुशद-ओ-हिदायत कार फ़र्मा है, वहीं इस में दुनयवी उमूर में भी इंसानों की रहनुमाई की गई है। जिस तरह दीन का मक्

सब हमद-ओ-सताइश अल्लाह रब उल आलमीन के लिए है। कायनात के ख़ालिक़-ओ-मालिक अल्लाह ताला के नाज़िल कर्दा दीन में जहां उखरवी मुआमलात में रुशद-ओ-हिदायत कार फ़र्मा है, वहीं इस में दुनयवी उमूर में भी इंसानों की रहनुमाई की गई है। जिस तरह दीन का मक्सद आख़िरत में इंसानों को सरफ़राज़-ओ-बुलंद करना है, इसी तरह ये दीन अल्लाह ताला ने इस लिए नाज़िल फ़रमाया कि इंसानियत इस दीन से वाबस्ता होकर दुनिया में भी ख़ुशबख़ती और सआदत मंदी की ज़िंदगी बसर करे।

तौबा के मायना हैं पलट्ना, रुजू होना। गुनाहों के दलदल में फंसा हुआ बंदा जब अपने गुनाहों पर नादिम होकर ख़ुदा की तरफ़ पलट्ता है और फ़र्मांबरदारी और बंदगी की रविष इख़तेयार करता है तो इस कैफ़ीयत को क़ुरान तौबा से ताबीर करता है।

इस्तिग्फ़ार ये है कि बंदा अपने गुनाहों के एहसास से शर्मसार होकर ख़ुदा से दरख़ास्त करे कि परवरदिगार! मेरे गुनाहों पर अफ़वो करम का पर्दा डाल दे। तौबा‍ ओर‌-इस्तिग़फ़ार बंदे की एक पसंदीदा सिफ़त है। अल्लाह के रसूल स.व. का इरशाद है कि लोगो! ख़ुदा से अपने गुनाहों की माफ़ी चाहो और ख़ुदा की तरफ़ पलट आओं। देखो! में दिन में सौ बार अपने गुनाहों की माफ़ी चाहता हूँ।

अल्लाह ताला जिस चीज़ से सब से ज़्यादा ख़ुश होता है, वो बंदे का तौबा-ओ-इस्तिग़फ़ार है। हुज़ूर नबी अकरम स.व. ने इस कैफ़ीयत को एक मिसाल के ज़रीया यूं वाज़िह फ़रमाया है कि अगर तुम में से किसी का ऊंट एक बे आब-ओ-गयाह जंगल‌ में गुम हो गया हो, खाने पीने का सामान भी इसी ऊंट पर लदा हो और वो शख़्स हर चहार जानिब उस को ढूंढ ढूंढ कर मायूस हो चुका हो। फिर ज़िंदगी से नाउम्मीद होकर किसी दरख़्त के नीचे लेटा रहा, ठीक उसी हालत में वो अपने ऊंट को सामान से लदा हुआ अपने सामने खड़ा देखे तो इस को जैसी ख़ुशी होगी, परवरदिगार आलम को इस से भी ज़्यादा ख़ुशी उस वक़्त होती है, जब कोई भटका हुआ बंदा ख़ुदा की तरफ़ पलट्ता है और फ़र्मांबरदारी की रविष इख़तियार करता है।

क़ुरान-ए-करीम में अल्लाह ताला ने तौबा-ओ-इस्तिग्फ़ार के फ़वाइद का ज़िक्र किया है। हज़रत नूह अलैहि स्सलाम के मुताल्लिक़ क़ुरान-ए-पाक में अल्लाह ताला का फ़रमान है कि उन्हों ने अपनी क़ौम से कहा: पस मैंने कहा! अपने परवरदिगार से गुनाहों की माफ़ी तलब करो, बेशक वो बड़ा बख़शने वाला है, आस्मान से तुम पर मूस्लाधार बरसात‌ बरसाएगा और तुम्हारे मालों और औलाद में इज़ाफ़ा फ़रमाएगा और तुम्हारे लिए नहरें बनाएगा।

हाफ़िज़ इबन कसीर रहमत उल्लाह अलैहि अपनी तफ़सीर में फ़रमाते हैं कि अगर तुम अल्लाह ताला के हुज़ूर तौबा करो, इस से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगो और इस की इताअत करो तो वो तुम पर रिज़्क की फ़रावानी फ़रमाएगा, आस्मान से बारान-ए-रहमत नाज़िल फ़रमाएगा, ज़मीन से ख़ैर-ओ-बरकत उगलवायेगा, ज़मीन से खेती उगाएगा, जानवरों का दूध मुहय्या फ़रमाएगा, तुम्हें अम्वाल और औलाद अता फ़रमाएगा, क़िस्म किस्म के मेवाजात वाले बाग़ात अता फ़रमाएगा और उन बाग़ों के दरमयान नहरें जारी फ़रमाएगा।

हज़रत इमाम हसन बस्री रहमत उल्लाह अलैहि के पास चार अश्ख़ास आए और हर एक ने अपनी मुश्किल ब्यान की। एक ने कहतसाली का ज़िक्र किया, दूसरे ने तंगदस्ती का, तीसरे ने औलाद ना होने का और चौथे ने अपने बाग़ की ख़ुश्कसाली का ज़िक्र किया। हज़रत हसन बस्री रहमत उल्लाह अलैहि ने चारों अश्ख़ास को अल्लाह ताला से गुनाहों की माफ़ी तलब करने और इस्तिग़फ़ार पढ़ने की नसीहत फ़रमाई।

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