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दरगाह हज़रत मीर मोमिन चुप (रह), आलीयाबाद ,खन्डरात में तब्दील

हैदराबाद 17 अगस्त : शहर हैदराबाद को इस बात का एज़ाज़ हासिल है कि इस सरज़मीन को बुज़ुर्गाने दीन ने अपने मुक़द्दस वजूद के ज़रीए रौनक बख़्शी और इंसानों की रहनुमाई का फ़रीज़ा बख़ूबी अंजाम दिया। उन के अख़्लाक़ और किरदार तक़वा और परहेज

हैदराबाद 17 अगस्त : शहर हैदराबाद को इस बात का एज़ाज़ हासिल है कि इस सरज़मीन को बुज़ुर्गाने दीन ने अपने मुक़द्दस वजूद के ज़रीए रौनक बख़्शी और इंसानों की रहनुमाई का फ़रीज़ा बख़ूबी अंजाम दिया। उन के अख़्लाक़ और किरदार तक़वा और परहेज़गारी और सब से बढ़ कर इश्क़े नबी (स.अ.व) लोगों को नेकी की राह पर गामज़न होने के लिए आमादा करना था।

इन औलियाए अल्लाह और बुज़ुर्गाने दीन बिला लिहाज़ मज़हबो मिल्लत हर इंसान के साथ इस क़दर हुस्ने सुलूक से पेश आते कि उन से मुलाक़ात करने वाले गैर मुस्लिम मर्द और ख़्वातीन हमेशा हमेशा के लिए उन के अक़ीदत मंद बन जाते। हमारे शहर और शहरियों की ख़ुश नसीबी है कि यहां कसीर तादाद में अल्लाह के महबूब बंदे आराम फ़र्मा हैं और उन के मज़ारात बने हुए हैं ये दरगाहों और आस्तानों से दुनिया को अमन और मुहब्बत और इंसानियत का प्याम मिलता है।

लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि शहर में कई ऐसी दर्गाहें और उन के तहत मौजूद मसाजिद और क़ब्रिस्तान हैं जो आज हमारी अपनी ग़फ़लत और लापरवाही के बाइस खन्डरात में तब्दील हो चुके हैं जब कि इन दरगाहों की कीमती आराज़ीयात और क़ब्रिस्तानों पर नाजायज़ क़ब्ज़े करते हुए वहां गैरकानूनी तामीरात करली गई हैं । क़ारईन ! तारीख सूफिया किराम और सलातीन दक्कन सलतनते क़ुतुब शाही नामी किताब की जिल्द अव्वल हमारे हाथ लगी।

इस किताब के मुताला के दौरान जब हम हज़रत मीर मोमिन चुप (रह) के बारे में तहरीर कर्दा मज़मून पर पहुंचे तो हमारे दिल में भी ख़ाहिश हुई कि क्यों ना बैरून आलीयाबाद वाक़े इस अज़ीम बुज़ुर्ग के मज़ार की ज़ियारत की जाए । चुनांचे हमारे इसी शौक़ ने हमें दरगाह हज़रत मीर मोमिन चुप (रह) तक पहुंचा दिया। दरगाह शरीफ़ पहुंचने से क़ब्ल हमारे ज़हन में इस दरगाह इस के तहत की मस्जिद और क़ब्रिस्तान का जो तसव्वुर था वहां पहुंच कर हमारे ज़हन और क़ल्ब से वो तसव्वुर अचानक रफू चक्कर हो गया।

जब कि हमें बाहर से ही खन्डरात नज़र आने लगे । दरगाह का मेन दरवाजाइस क़दर शिकस्ता और बोसीदा हो गया है कि किसी भी वक़्त बड़ी ख़ामोशी से ज़मीन दोज़ हो सकता है । हम बड़ी मुश्किल से इस तबाहकुन मेन दरवाजाकी बजाय बाज़ू के कचरा दान और कचरा के ढेर को उबूर करते हुए दरगाह शरीफ़ तक पहुंच ही गए । अगर्चे दरगाह अच्छी हालत में है लेकिन इस के अहाता में जो क़ब्रिस्तान है वहां क़ुबूर को मिस्मार करते हुए नाजायज़ क़ब्ज़े कर लिए गए हैं और बची कुची क़ब्रिस्तान की अराज़ी खन्डरात में तब्दील हो गई है।

आप (रह) ईरान में पैदा हुए इस्म मीर मोमिन और उर्फ़ीयत शाह मोमिन चुप थी जब कि लक़ब सैफुल्लाह था । आप का शुमार सादात रिज़वीया सिलसिले के साहिबे दिल बुज़ुर्गों में होता है । आप के बारे में कहा जाता है कि आप (रह) हज़रत अमीन उद्दीन अली आला चिश्ती बीज पूरी के मासरीन में से थे कई ममालिक की सैर और सयाहत करते हुए जुमला 60 फ़िक़रा के साथ सुल्तान मुहम्मद क़ुतुब शाह के दौर में ईरान से हैदराबाद दक्कन तशरीफ़ लाए और अपने क़ियाम के लिए आलीयाबाद को पसंद फ़रमाया।

चूँकि आप बात-चीत नहीं करते थे और ज़रूरतमंदों का जवाब इशारों से दिया करते थे इस लिए आप (रह) हज़रत शाह मोमिन चुप के नाम से मशहूर हो गए । आप 1615 में इस मुक़ाम पर विसाल फ़रमाए और वहीं आप की तदफ़ीन अमल में आई । क़ुतुब शाही हुक्मरानों की तरह आसिफ़ जाहि हुक्मरानों को आप की बारगाह से ख़ुसूसी अक़ीदत थी। नवाब अफ़ज़ल उद्दौला बारगाह में हाज़िरी देने आया करते थे और उर्स के लिए ख़ुसूसी मसारिफ़ भी फ़राहम किए जाते थे।

दिलचस्पी की बात ये है कि दरगाह हज़रत मीर मोमिन चुप पर दिन में पाँच मर्तबा नौबत बजाई जाती थी । इस दरगाह के बारे में एक और हैरत अंगेज़ बात ये है कि मक्का मस्जिद और दरगाह हज़रत मीर मोमिन चुप (रह) के तहत तक़रीबन 26 हज़ार गज़ अराज़ी ही मुख़तस की गई थी।

दरगाह हज़रत मीर मोमिन चुप का वक़्फ़ रेकॉर्ड
Hyd/1825: Dargah Syed Shah Mir Momin Chup
Chila-1, Khankha-1, Masjid-1, Graveyard-1
(s)-53, Outside aliabad, Ward-18,
Sqyds-26038, Gaz.No.20-A
SI 1971, Date 16-05-85, Page-5

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