Tuesday , December 12 2017

दिल्ली गैंगरेप : “जख्म आज भी हरे”

उस भयानक वाकिया का एक साल पूरा होने को है। खाती दरिंदों को सजा भी सुना दी गई है। लेकिन मुतास्सिरा के वालिदैन के जख्म अभी भी हरे हैं। खानदान वाले ही नहीं, मुल्क के हर शख्स उस खौफनाक वाकिया को याद कर सिहर उठता है। मुल्क की दारुल हुकूमत

उस भयानक वाकिया का एक साल पूरा होने को है। खाती दरिंदों को सजा भी सुना दी गई है। लेकिन मुतास्सिरा के वालिदैन के जख्म अभी भी हरे हैं। खानदान वाले ही नहीं, मुल्क के हर शख्स उस खौफनाक वाकिया को याद कर सिहर उठता है। मुल्क की दारुल हुकूमत में पिछले साल 16 दिसंबर को रेप की शिकार हुई मुतास्सिरा के घरवालों को अभी भी उस दिन का इंतेजार है, जब मुजरिमों को फांसी पर लटकाया जाएगा।

चलती बस में दरिंदगी की शिकार होने के बाद 13 दिन कि ज़िंदगी और मौत की लड़ाई करते हुए मौत से हारने वाली 23 साल की फीजियोथेरेपी तालिबा के वालिद ने आईएएनएस से कहा, “हमारे लिए बस वक्त ही गुजरा है। लेकिन उसके (मुतास्सिरा) जख्मों की तरह ही हमारे जख्म आज भी हरे हैं। मुझे नहीं लगता कि हम कभी इससे उबर पाएंगे।” ‘रौशन मुस्तकबिल’ की ओर कदम बढ़ाने वाली अपनी ‘ बेटी’ के आखिरी दिनों को याद करते हुए उनकी आंखों से आंसू टपक पड़े। मुतास्सिरा ने देहरादून से फीजियोथेरेपी की पढ़ाई किया था और दिल्ली के एक प्राईवेट हास्पिटल में बतौर इंटर्न मुलाज़िम थी।

मुतास्सिरा के वालिद ने कहा, “वह जब भी देहरादून से आती थी, दरवाजे के पीछे छिपकर मुझे चौंका देती थी।” इंदिरा गांधी बैनुल अकवामी हवाईअड्डे पर कुली का काम करने वाले 54 साला शोकाकुल ने आगे कहा, “उसकी हर चीज मेरे दिमाग में हमेशा घूमती रहती है। मेरे लिए वह अभी भी जीवित है। मेरे लिए समय जैसे ठहर-सा गया है। लगता है, जैसे वह अभी भी दरवाजे के पीछे छिपी हुई है और अचानक कभी भी मेरे सामने आ जाएगी।”

मुतास्सिरा के वालिद की अब एक ही खाहिंश है, दरिंदों को जल्द से जल्द फांसी। मगरिबी दिल्ली के द्वारका में अपने दो कमरों वाले घर में बैठे मुतास्सिरा के वालिद ने बताया कि, “मुजरिमों को फांसी मिलने के बाद ही मुझे इत्मिनान होगा। इससे मेरे खानदान वालों को कुछ तसल्ली मिलेगी।”

पिछले साल मुल्क की दारुल हुकूमत में एक चलती बस में पांच लोगो की हवस का शिकार बनी मुतास्सिरा 13 दिनों तक ज़िंदगी के लिए जूझती रही।

दिल्ली की एक अदालत की तरफ से चार मजरिमों को सुनाई गई सजा ए मौत की सजा से मुतास्सिरा का खानदान खुश हैं। एक मुजरिम (बस के ड्राईवर) ने अदालती हिरासत के दौरान तिहाड़ जेल में खुदकुशी कर ली थी। दूसरी ओर, मुतास्सिरा के रिश्तेदार नाबालिग मुजरिम को मिली सजा से खुश नहीं हैं। नाबालिग मुल्ज़िम को Juvenile Justice Board ने तीन साल सुधार गृह में रहने की सजा सुनाई है।

चार मुल्ज़िमों को मिली सजा ए मौत की सजा के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अभी सुनवाई चल रही है। मुतास्सिरा के वालिद ने बताया, “हमने सुप्रीम कोर्ट से Juvenile Justice Board के फैसले पर फिर से गौर करने की गुजारिश किया है।” वालिद ने थोड़ा गुस्से से कहा, “किसी मुल्ज़िम को सिर्फ इसलिए कैसे छोड़ा जा सकता है कि वह नाबालिग है। वह उस खफनाक वाकिया में शामिल था। उसे भी फांसी दी जानी चाहिए, ताकि दूसरों को सबक मिले।”

बाजू में ही बैठी मुतास्सिरा की वालिदा सब चुपचाप सुनती रहीं और मुसलसल आंसू बहाती रहीं। उन्होंने बताया कि उनके मन में बेटी की आखिरी वक्त की तस्वीर जैसी जम सी गई है। गमों में डूबी हुई इस माँ ने बताया कि, “उस शाम जब वह घर से जा रही थी, मैं कभी भूल नहीं सकती। उसने हाथ हिलाकर मुझसे विदा ली और उसके आखिरी अल्फाज़ थे, “बाय मॉम, मैं कुछ ही घंटों में आ जाऊंगी”।” “पर वह घर नहीं लौटी, कभी लौटेगी भी नहीं।”

मुतास्सिरा के घर वालो ने जुमे के रोज़, 16 दिसंबर को पीड़िता की बरसी पर दिल्ली के बीच में ‘कांस्टिट्यूशन क्लब’ में मुतास्सिरा की याद में एक खिराज की तकरीब मुनाकिद करने की मुहिम बना रहे हैं। वालिद ने बताया, “हमारी ताईद करने वाले सभी लोगों को हम शुक्रिया कहना चाहते हैं।”

अपनी बेटी के आखिरी लम्हों को याद करते हुए उसके वालिद ने कहा कि उनके मन में एक कसक रह गई कि वह अपनी बेटी की आखिरी ख्वाहिश पूरी नहीं कर सके।

उन्होंने कहा, “वह पानी पीना चाहती थी, पर डाक्टरों ने मुझे उसे पानी देने से मना किया था। वह मुझसे पानी पीने के लिए कहती रही, पर मैं नहीं दे सका।” इतना कहते-कहते उनका गला रुंध गया।

TOPPOPULARRECENT