Thursday , December 14 2017

दिल्ली में मुसलमानों को किराया पर मकानात देने से इनकार

नई दिल्ली, ०३ अक्तूबर (एजेंसी) दिल्ली के तख़्त-ओ-ताज पर तक़रीबन एक हज़ार साल तक फ़ाइज़ (कामयाब) रहने वाले मुसलमानों को आज हिंदूस्तान के इस दार-उल-हकूमत ( राजधानी) में किराया पर मकान या फ़्लैट मिलना भी दुशवार हो गया है।

नई दिल्ली, ०३ अक्तूबर (एजेंसी) दिल्ली के तख़्त-ओ-ताज पर तक़रीबन एक हज़ार साल तक फ़ाइज़ (कामयाब) रहने वाले मुसलमानों को आज हिंदूस्तान के इस दार-उल-हकूमत ( राजधानी) में किराया पर मकान या फ़्लैट मिलना भी दुशवार हो गया है।

घरों और फ्लैट्स के मालकीयन ( मालिकों) को जैसे ही पता चलता है कि इनका इमकानी ( संभावना) किरायादार मुसलमान है वो फ़ौरी ( फौरन) अपने दरवाज़े बंद कर लेते हैं जैसे कि इनके घर में कोई तबाही-ओ-बर्बादी दाख़िल हो रही है। इस तरह का सुलूक सिर्फ मुसलमानों के साथ ही नहीं बल्कि हरियाणा से ताल्लुक़ रखने वाले बाशिंदों और शादी किए बिना एक साथ रहने के ख़ाहां ( चाहने वाले) जोड़ों के साथ भी रवा ( रखा जा रहा है।

दार-उल-हकूमत ( राजधानी) दिल्ली के प्रॉपर्टी ब्रोकर्स (जायदाद के दलालों) के एक सर्वे में समाज में पनप रहे इस ख़तरनाक रुजहान का इन्किशाफ़ ( ज़ाहिर/ पर्दा साफ ) हुआ। इस हालिया सर्वे में बताया गया है कि मकानदार या मालकीयन मकानात-ओ-फ्लैट्स मकानात-ओ-फ्लैट्स किराया पर देने के दौरान मुसलमानों, नाजायज़ तौर पर एक साथ रहने वाले ग़ैर शादीशुदा जोड़ों और हरियाणवी लोगों के साथ इमतियाज़ी (विशेष/ खास) सुलूक बरतते हैं और उन्हें अपना किरायादार नहीं बनाते।

सेंटर फ़ार सियोल सोसायटी की जानिब से किए गए सर्वे में बताया गया है कि मालकीयन मकानात-ओ-फ्लैट्स की अपनी तरजीहात होती हैं। ग़ैर शादी शूदा जोड़े मकानदारों के लिए सब से बड़ी आफ़त तसव्वुर किए जाते हैं और ख़ासकर उन मकानदारों के लिए जो एक ही इमारत में मुक़ीम (रहने वाले) हों।

ये जोड़े बड़ी परेशानी का बाइस ( कारण) समझे जाते हैं। सर्वे के दौरान जिन मकानदारों के इंटरव्यूज़ लिए गए इन में से 88 फ़ीसद ने कहा कि वो ग़ैर शादीशुदा मर्द और ख़वातीन को हरगिज़ अपने किरायादार नहीं बनाएंगे। मकानदारों के इस मौक़िफ़ ( निश्चय) के नतीजा में दिल्ली में मुक़ीम रह कर काम करने वाले भाई और बहन को तक मुश्किलात का सामना करना पड़ रहा है।

अक्सर भाई बहन को भी अपने रिश्ता से मुताल्लिक़ दस्तावेज़ी ( कागजात) सुबूत फ़राहम करना पड़ता है।

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