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दुनिया की समाजी और मज़हबी तब्दीली का दौर

हर अज़ीम हस्ती की विलादत से पहले काफ़ी मुश्किल हालात पैदा होते हैं, या यूं कहें कि हर सिम्त मुश्किलात पैदा होने के बाद ही ख़ुदा किसी अज़ीम हस्ती को भेजता है। हिंदूस्तान की भी हालत आज से तक़रीबन दो हज़ार साल पहले बहुत ख़राब थी। क़दीम हिंदू

हर अज़ीम हस्ती की विलादत से पहले काफ़ी मुश्किल हालात पैदा होते हैं, या यूं कहें कि हर सिम्त मुश्किलात पैदा होने के बाद ही ख़ुदा किसी अज़ीम हस्ती को भेजता है। हिंदूस्तान की भी हालत आज से तक़रीबन दो हज़ार साल पहले बहुत ख़राब थी। क़दीम हिंदूस्तान की तारीख़ में सबसे गहरी तारीकी का दौर मज़ालिम का दौर है, जो तक़रीबन सन ५०० से शुरू होता है।

उस वक़्त मंदिरों में मूर्ती की पूजा का हर तरफ़ आम रिवाज और और मंदिरों के पुजारी तरह-तरह की मूर्तियों के इजाराहदार बने, जो मज़हब की आड़ में भोले भाले मुसाफिरों को लूटा करते थे।

ज़ात पात की वजह से ग़ैरमामूली ऊंच नीच का बोल बाला हो गया था। औरतों को दाश्ता का मुक़ाम दिया गया।

दस्तूर इस किस्म का बना जो ख़ुसूसी तौर पर जनिबदारी से भरपूर था। ब्राह्मण चाहे कितना ही ज़ुल्म क्यों ना करे, सज़ाए मौत का मुस्तहिक़ कभी नहीं होता था। निचली ज़ात का कोई शख़्स अगर ऊंची ज़ात की किसी शादीशुदा औरत के साथ जिन्सी ताल्लुक़ क़ायम कर ले तो उसे सज़ाए मौत दी जाती थी, लेकिन अगर ऊंची ज़ात का कोई मर्द निचली ज़ात की किसी शादीशुदा औरत से जिन्सी ताल्लुक़ क़ायम कर लेता तो उसे बराए नाम सज़ा दी जाती थी।

अगर निचली ज़ात का कोई शख़्स ऊंची ज़ात वालों को नसीहत करे तो गर्म तेल उसके मुँह में डालने का रिवाज था। गाली देने पर ज़बान काटने की सज़ा थी। शराब पीना राजाओं की शान की अलामत थी। शाही ख़ानदान की औरतें भी शराब के नशे में मदहोश घूमती थीं। सड़कों पर बदमाशों का मजमा लगा रहता था।

तमाम तारीख़ी शहादतों से ये भी साबित होता है कि मुहम्मद (स‍०अ०व०) साहिब की विलादत से पहले ईसाईयों में कितनी बुराईयां फैल गई थीं (जॉर्ज सेल का तर्जुमा क़ुरआन मजीद, पहला एडीशन, दीबाचा सफ़ा २५,२६) जॉर्ज सेल ने अपने तर्जुमा क़ुरआन के दीबाचा में लिखा है कि गिरजाघर के पादरियों ने मज़हब के टुकड़े टुकड़े कर डाले थे और अमन-ओ-मुहब्बत और अच्छाईयां उन से दूर हो गई थीं, वो हक़ीक़ी मज़हब को भूल गए थे।

मज़हब के बारे में किस्म किस्म के अक़ाइद ईजाद करके उन पर अमल करते थे। इन्ही गिरजाघरों में बहुत से तुहमात को मज़हब क़रार दे कर उन पर अक़ीदा रखा जाने लगा और बहुत ही बेशर्मी से मूर्ती की पूजा भी शुरू हो गई।

मुहम्मद (स०अ०व०) साहब से पहले ईसाई मज़हब और मूर्ती की पूजा दोनों ने मिल कर एक नया रूप इख्तेयार कर लिया, जिसकी वजह से ईसाईयों में मूर्ती की पूजा आम हो गई और ख़ुदाए वाहिद के मुक़ाम पर तीन ख़ुदा बैठा दिए गए (हज़रत बीबी) मरियम (हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की वालिदा) को ख़ुदा की माँ समझा जाने लगा।

(डाक्टर वेद प्रकाश उपाध्याय तर्जुमा: मौलाना ग़ुलाम नबी शाह नक़्शबंदी )

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