दुनिया में हथियारों की खरीद ब्रिकी में इज़ाफा, अमेरिका को हो रहा है ज्यादा फायदा

दुनिया में हथियारों की खरीद ब्रिकी में इज़ाफा, अमेरिका को हो रहा है ज्यादा फायदा

सिपरी का कहना है कि पिछले पांच साल के दौरान 2016 में एक बार फिर हथियारों की बिक्री में इजाफा देखने को मिला है. 2015 के मुकाबले 2016 में 1.9 प्रतिशत ज्यादा हथियार बिके जबकि 2002 से तुलना की जाए तो यह वृद्धि 38 प्रतिशत है.

सिपरी की ताजा रिपोर्ट कहती है कि 2016 में दुनिया की 100 सबसे बड़ी हथियार निर्माता कंपनियों ने 374.8 अरब डॉलर के हथियार और उनसे जुड़े सिस्टम बेचे.

खासकर अमेरिकी कंपनियां ज्यादा हथियार बना रही हैं और दुनिया में उन्हें बेच रही हैं. रिपोर्ट कहती है कि 2016 में अमेरिकी कंपनियों की बिक्री 4 प्रतिशत बढ़ी और उन्होंने 217.2 अरब डॉलर के हथियार बेचे.

बिक्री में इस वृद्धि की वजह सिर्फ विदेशों में तैनात अमेरिकी सेना को होने वाली हथियारों की सप्लाई नहीं है बल्कि अन्य देश भी अमेरिकी कंपनियों से हथियार खरीद रहे हैं.

दुनिया भर में हथियार बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी लॉकहीड मार्टिन ब्रिटेन, इटली और नॉर्वे जैसे देशों को अपने नए एफ-35 लड़ाकू विमान बेचने में कामयाब रही. हालांकि उसका सबसे बड़ा ग्राहक अमेरिकी वायुसेना ही है.

दुनिया भर में बिकने वाले 57.9 प्रतिशत हथियार अमेरिकी कंपनियों ने बनाये जबकि इस मामले में दूसरे नंबर पर पश्चिमी यूरोप है. इसके बाद रूस का नंबर आता है. दुनिया भर में बिकने वाले हथियारों में उसकी हिस्सेदारी 7.1 प्रतिशत है.

पश्चिमी यूरोप में मिली जुली तस्वीर दिखती है. फ्रांस और इटली जैसे देशों के हथियारों की बिक्री कम हुई, वहीं ब्रेक्जिट के बावजूद जर्मनी और ब्रिटेन की कंपनियों की बिक्री बढ़ी है.

मिसाल के तौर पर टैंक बनाने वाली जर्मन कंपनी क्राउस माफेई और बख्तरबंद गाड़ियां बनाने वाली राइनमेटल कंपनी को यूरोप, मध्य पू्र्व, और दक्षिण पूर्व एशिया में अपने उत्पादों की मांग बढ़ने का फायदा हुआ है.

सिपरी में हथियार और सैन्य खर्च कार्यक्रम की निदेशक ऑडे फ्लूरेंट कहती हैं, “यह कहना मुश्किल है कि हथियारों की खरीद और दुनिया भर में चल रहे संकटों के बीच कोई सीधा संबंध है.

लेकिन हां, कहीं ना कहीं संबंध तो है. खास प्रकार के हथियारों की काफी मांग हैं जिनमें गोलाबारूद, मिसाइल और गाड़ियां शामिल हैं.” वह कहती हैं कि हथियारों की बिक्री में भड़कते संकट एक अहम कारण हैं.

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