Monday , December 18 2017

नई नसल की दिन से दूरी तशवीशनाक

इस्लाम ने मोमिन मर्द-ओ-औरत को ना सिर्फ़ गैर मुहर्रम से हिजाब करने की हिदायत दी है बल्कि मुस्लिम औरतों को यहूद-ओ-नसारा की औरतों और एसी औरतों से भी पर्दा करने की ताकीद फ़रमाई है जो फ़हश और बेहयाई की बातें करती हैं।

इस्लाम ने मोमिन मर्द-ओ-औरत को ना सिर्फ़ गैर मुहर्रम से हिजाब करने की हिदायत दी है बल्कि मुस्लिम औरतों को यहूद-ओ-नसारा की औरतों और एसी औरतों से भी पर्दा करने की ताकीद फ़रमाई है जो फ़हश और बेहयाई की बातें करती हैं।

इस्लाम में गैर मुहर्रम तो कीया मुहर्रम मर्द-ओ-औरतों के लिए भी तन्हाई में मेल जेल से गुरेज़ करने की तलक़ीन की गई है मगर आज हम जिधर देखते हैं उधर मर्द-ओ-औरत का मेल जेल दिखाई देता है और इस माहौल में मुस्लिम भी रंग गए हैं।

एक औरत को बगैर मुहर्रम के किसी अजनबी से तन्हाई में रहना मना है। ये एहतियात इस लिए भी मल्हूज़ रखना ज़रूरी है कि जब मुख़ालिफ़ जिन्स तन्हाई में होते हैं तो शैतान मलऊन एक दूसरे के दिल में उन्सियत उलफ़त-ओ-क़ुरबत के जज़बात को भड़काता है और दोनों को करीब करने इन में शहवानी जज़बात को उकसाता है।

यही वजह हैके कभी कभार हमें एसे वाक़ियात भी सुनने में मिलते हैं कि बाप ने अपनी बेटी की इस्मत को तार तार करदिया तो कभी भाई ने बहन के दामन इफ़्फ़त को चाक करदिया है।

इस्लाम ने हमें जो तरबियत दी है इस के मुताबिक़ जब औरतों को अशद ज़रूरत घर के बाहर निकलना पड़े तो वो चादर अच्छी तरह ओढ़ लिया करें ताकि उनकी शनाख़्त ना होने पाए बल्कि उन्हें ये भी हिदायत दी हैके वो सड़क के किनारे किनारे चौक और अपने सर को झुकाए रखें।

यही नहीं बल्कि वो ना ही ख़ुशबू इस्तेमाल करे और ना ही एसे ज़ेवरात ज़ेब तन करे जो चलने पर आवाज़ पैदा करते हैं ताकि कोई उन की तरफ़ मुतवज्जा ना होने पाए।

और आज ये सूरते हाल हैके हमारी बेटियां बाग़ात, तफ़रीही मुक़ामात, मल्टी प्लेक्स, शॉपिंग मॉल्स वगैरह में हैरान अंगेज़ कपड़े पहने अपने ब्वॉय फ्रेंड बल्कि बाज़ तो ब्वॉय फ्रेंड्स के साथ बाहों में बाहें डाले एसे घूमती फुर्ती हैं कि मियां बीवी भी उन्हें देख कर शर्मा जाएं।

आज तकरीबन हर घराने में रिश्तों के भाईयों से हिजाब का तसव्वुर ही नहीं पाया जाता। ख़ालाज़ाद फोपी ज़ाद और चचाज़ाद भाई और बहन एसे घुल मिल कर रहते हैं जैसे वो एक दूसरे पर हराम हूँ। यही नहीं आज सूरते हाल ये है कि हमारी लड़कियां गैर मुस्लिमों पर फ़रेफ़्ता होरही हैं और उन्हें पाने अपनी इफ़्फ़त ही नहीं अमान का तक सौदा कररही हैं।

ये तबदीली यक़ीनन उम्मते मुस्लिमा के लिए बड़ी ही तशवीश का मूजिब है। एसे वाक़ियात के तदारुक के लिए जहां फ़िलफ़ौर इक़दामात किए जाने चाहीए वहीं हमें अपना मुहासिबा भी करना चाहीए कि एसे हालात क्युंकर पैदा होरहे हैं।

नई नसल के बिगाड़ में वालिदेन का कितना हिस्सा है? आख़िर हमारी नई नसल अमान पर शहवत को क्यों तरजीह देने लगी है? दरअसल बच्चों की ख़सलत वफ़तरत पर वालिदॆन की आदात-ओ-अत्वार का गहिरा असर पड़ता है और ये अमल उसी वक़्त से शुरू होजाता है जब बच्चा मादर शिकम में नम्मो के मदारिज तए करना शुरू करता है।

वालिदेन ख़ासकर माँ का बच्चे की शख्सियत पर गहिरा असर पड़ता है। यही वजह हैके माँ की गोद को बच्चे का पहला मकतब क़रार दिया गया है।

हमारे इस्लाफ़ की माएं जो बड़ी ख़ुदातरस हुआ करती थीं वज़ा हमल के साथ ही अपने रब से रिश्ते को और भी ज़्यादा मज़बूत करलिया करती थीं ताकि उनके शिकम में परवरिश पाने वाली औलाद पर इस के अच्छे असरात मुरत्तिब हूँ। अय्याम हमल में उनके मामूलात में तिलावत क़ुरआन मजीद विरद दरूद शरीफ़ और वज़ाइफ़ का इज़ाफ़ा होजाता था और आज की माओं का ये मामूल है कि उनके शब-ओ-रोज़ टेली वीज़न पर वाहियात सीरीयलस के मुशाहिदा की नज़र होजाते हैं। यही वजह है कि आज वालिदेन अपनी ही औलाद के वजूद पर नादिम-ओ-पशेमां होने लगे हैं? बेटी की एक तमन्ना को पूरा करने अपना सब कुछ निछावर करदेने पर आमादा बाप पर एक वक़्त एसा आने लगा है कि अपनी लख़ते जिगर से एसे घिन आने लगती है और उसकी एक एक अदा पर मर मिटने वाली माँ ही अपनी दुलारी की जान की दुश्मन बन जाती है।

वजह ये होती है कि बेटी इस लाड-ओ-दुलार में बिगड़ कर अपना शरीक सफ़र ख़ुद ढूंढ लेती है हत्ता कि वो इस क़दर अंधी होजाती है कि अपना अमान भी खोदीती है और अपनी पसंद के लड़के को अपना शरीक सफ़र बनाने वो समीआ से स्म्रती यह सुमन बन जाती है और सात फेरे ले लेती है यह पादरी के आगे अँगूठी पहनाकर मुर्तद बन जाती है।

एसे वाक़ियात अभी हर घर ना सही हर ख़ानदान के किसी ना किसी रिश्तेदार यह पड़ोस में पेश आने लगे हैं। इस के लिए कौन ज़िम्मेदार हैं? क्या सिर्फ़ लड़कियां ही ख़ुद अपने बिगाड़ का सबब हैं यह फिर वालिदेन भी उनके ज़िम्मेदार हैं?। हम सब को अपना मुहासिबा करते हुए अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास करना चाहीए।

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