Tuesday , December 12 2017

नजर आने लगे गरीबों के मसीहा

इलेक्शन का वक्त आते ही एक एक गरीब के वोट कीमती हो जाते है सबको गरीबों की फिक्र होने लगती है | इलेक्शन के बाद गरीब और गरीबी बहस व फाइव स्टार होटल में मुनाकिद सेमिनार का मौजू बनकर रह जाता है |

इलेक्शन का वक्त आते ही एक एक गरीब के वोट कीमती हो जाते है सबको गरीबों की फिक्र होने लगती है | इलेक्शन के बाद गरीब और गरीबी बहस व फाइव स्टार होटल में मुनाकिद सेमिनार का मौजू बनकर रह जाता है |

अगर हम रियासत बिहार की बातें करें तो पिछले आठ सालों से बदलते बिहार की तस्वीर दिखाई जा रही है तरक्की के बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं | तरक्की की शरह में इज़ाफा व हर शख्स की आमदनी में इज़ाफे के आंकड़े पेश किए जा रहे हैं | लेकिन इसके बावजूद गरीबों की तादाद में इज़ाफा के भी आंकडे सामने आ रहे हैं |

हिंदुस्तान तरक्की याफ्ता मुल्क बनने की ओर तैयार है लेकिन मुल्क के गरीबों की तरक्की नहीं हो रही है | वो ध्रुव तारे की तरह अपने हालात पर अटल है | आज मुल्क में अगर हम सरकारी ज़ुबान में कहें तो जितनी फलाही मंसूबे गरीबों के लिए है उस हिसाब से गरीबों का फायदा नहीं हो रहा है | दूसरी ओर अमीरों की किस्मत ऐसी कि पिछले 67 सालों से वे और अमीर होते गए | गरीब ज़्यादा मेहनत करने के बजाए, अपनी किस्मत को कोसने में लगे रहे |

सच तो यह है कि मुल्क में कानून बनाने वालों में ज़्यादातर ऐसे हैं जिन्होंने गरीबी को कभी महसूस ही नहीं किया है \ तभी तो गरीबों की रोज़ाना की कमाई 100-150 ( मनरेगा के तहत ) रूपये कर देने से सिर्फ अपनी पीठ खुद थपथपाते हैं | गरीबों का मज़ाक यह कह कर उड़ाया जाता है कि रोज़ाना 23 रू कमाने वाला इंसान गरीब नहीं है |

आइये एक गरीब खानदान के बजट को समझने की कोशिश करते हैं | अगर खानदान में चार मेम्बर हैं तो 23 रूपये में 5.75 रूपया एक इंसान को मिलता है | फुड सेक्युरिटी कानून के तहत अनाज ज़्यादा से ज़्यादा 3 रूपये का 1 किलो मिलता है | 23 रूपये 30 दिन अगर मुसलसल कमाए जाये तो महीने के 690 रूपये एक इंसान के खानदान में हर महीने 10 किलो चावल और 20 किलो गेंहू की ज़रूरत होती है | यानी 30 रूपये का चावल और 120 रूपये का आटा ( पिसाई जोड़ कर ) मतलब 150 रूपयों का आटा और चावल |

अब इसे पकाने के लिए तेल, मसाले, फ्यूल वगैरह की भी जरूरत पड़ेगी | मुल्क में अभी यह तय नहीं हुआ है कि सामाज़ी तौर पर हर शख्स के पास क्या होना चाहिए ? सबसे पहले 1960 में खपत केकी बुनियाआड पर गरीबी की डिफीनेशन तय की गई जिसकी बुनियाद पर तालीम और सेहत की जिम्मेदारी हुकूमत की है \

मुल्क में Poverty line के ज़रिये किसी इलाके के लोगों को गरीब और अमीर में तक्सीम किया जाता है | जैसे 500 रूपया हर महीना फी शख्स खर्च करने वाले लोगों को गरीब और 500 रूपये से ज्यादा खर्च करने वाले लोगों को अमीर कहा जाएगा |

देश में 1990 में 43.06 करोड़ ( 51.3% ) और 2005 में 45.6 करोड़ (42%) लोग गरीब थे. 2012 में नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAIR) के मुताबिक मुल्क में हर दस में तीन मुस्लिम Poverty Line से नीचे ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं |

उनकी आमदनी 550 ( हर माह) रूपये से भी कम है. इसके साथ ही UNDP की ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट में कहा गया कि हिंदुस्तान के बिहार,उत्तर प्रदेश, मगरिबी बंगाल, मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा, और राजस्थान में गरीबों की बाढ़ है |

इसके बाद 2010 में मंसूबा बंदी कमीशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक 37.5% हिंदुस्तानी Poverty Line के निचे ज़िंदगी गुज़ारते हैं. वहीं 2010 में ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के हिसाब के मुताबिक मुल्क में 55% लोग गरीब है | गरीबों के लिए अब तक जितनी भी मंसूबे बने है सही तरीके से उस पर अमल नहीं हो पाया है |

बिहार समेत कई रियासतों में गरीबों की तादाद व गरीबी के मयार को लेकर तनाज़ा है इस तनाज़े को दूर किए बिना एक बार फिर वोट के लिए गरीबों के मसीहा बनने की होड़ लग गई है | (सना रहमान)

—————बशुक्रिया: पलपल इंडिया डाट काम

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