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नजीब: 27 दिन बीत गए, माँ-बाप अभी उम्मीदों के साथ इंतज़ार में हैं

अपने सर के नीचे उँगलियों को दबाये, अपने घर के आँगन में चारपाई पर लेते नफीस अहमद शुरूआती सर्दी के सूरज की तरफ टाक रहे हैं। जबसे अक्टूबर 15 को दिल्ली की जवाहर लाल यूनिवर्सिटी से नजीब गायब हुआ है तब से नफीस, उत्तर प्रदेश के बदायूं के वेदोन टोला स्थित अपने घर में इसी तरह दिन रात बिता रहे हैं। वे बताते हैं, “मैं इन दिनों सो नहीं रहा हूँ। मैं सोचता हूँ क्या पता वह यहीं आ जाए और मुझे बेल सुनाई न दे।”

“क्या पता वह यहीं आ जाए” इसी वाक्य की वजह से अपने पति से 275 किमी दूर दिल्ली के जाकिर नगर में अपनी नन्द के घर नजीब की माँ भी नहीं सो पाती हैं। वे कहती हैं, “नींद ही नहीं आती है और जब आती है तब एकदम खुल जाती है। मेरा बच्चा कहाँ होगा क्या कर रहा होगा?”

ऐबीवीपी के छात्र कार्यकर्ताओं से झगडे के बाद, बायोटेक्नोलॉजी का छात्र नजीब जेएनयू के माही मांडवी हॉस्टल के रूम नंबर 166 से 15 अक्टूबर को गायब हो गया था। उसका पर्स, मोबाइल और लैपटॉप कमरे में ही मौजूद था जबकि उसकी एक चप्पल कमरे के बाहर तो दूसरी चप्पल सीडियों के पास पड़ी थी।

अफवाहे हैं कि प्रचार के लिए नजीब के कमरे में आये मेस सेक्रेटरी का चुनाव लड़ रहे ऐबीवीपी के सदस्य विक्रांत के हाथ में कलावा देख कर वह उत्तेजित हो गया था और उसका विक्रांत से झगड़ा हुआ था। दूसरी अफवाह यह भी है कि झगडे की वजह से तनाव में था और एंटी-डिप्रेसेंट दावा ले रहा था। यह भी अफवाह है कि तनाव की वजह से वह खुद हॉस्टल से चला गया होगा।

शनिवार को दिल्ली पुलिस ने यह मामला क्राइम ब्रांच को सोंप दिया। इससे पहले नजीब के नेपाल में होने की खबर पर दिल्ली पुलिस की एक टीम नेपाल भी गयी थी।

अपने बेटे के बिना उस रात क्या हुआ यह बताने में असमर्थ, अहमद और नफीस सिर्फ उस नजीब की बात कर रहे हैं जिसे वे जानते हैं। वे कहते हैं की नजीब ऐसे कहीं नहीं जा सकता था, उसने लड़ाई की शुरुआत बिलकुल नहीं की होगी, वह अपनी माँ को बताये बिना नहीं जा सकता था। वे कहते हैं कि डिप्रेशन थ्योरी पुलिस ने अपना बचाव करने के लिए गढ़ी है। परिवार ने दिल्ली के वसंत कुंज थाने में अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई है।

फातिमा कहती हैं, “मैं न्यूज़ चैनल को इंटरव्यू देते देते थक गयी हूँ। लेकिन कहीं से भी मेरे बेटे का सुराग नहीं मिला है। मैंने इससे पहले कभी यह सब नहीं किया लेकिन मैं अपने बेटे के लिए मुझसे जो कुछ भी होगा मैं करुँगी।”

वह कहती हैं, “नजीब मेरी सभी बाते मानता था। मुझसे पूछे बिना कुछ नहीं करता था। उसने बरेली के कॉलेज से बीएससी करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जेएनयू का फॉर्म भरा था। उसने जामिया में एडमिशन ले भी लिया था, लेकिन फिर जब उसका जेएनयू में भी हो गया तब उसने जामिया से एडमिशन कैंसिल करा लिया और जेएनयू में ले लिया। मैंने उसे मना किया था कि वहां न जाए वहां राजनीति होती है। लेकिन उसने सिर्फ यही बात नहीं मानी। वह कहता था मेरा राजनीति से क्या लेना देना।”

बदायूं में नजीब के पिता नफीस अहमद बताते हैं कि वह अपनी माँ से कितना करीब था। वे कहते हैं, “वह रोजाना अपनी माँ को फ़ोन कर बात किया करता था लेकिन अब 25-27 दिन हो गए उसका कुछ पता नहीं है ।”

उनके घर में बैठे रिश्तेदारों में से एक शख्स कहते हैं, “नेताओं के कुत्ते और भैंस खोने पर पुलिस ढून्ढ निकलती है। लेकिन यहाँ एक जवान इंसान यूनिवर्सिटी से गायब हो गया है और उसका कुछ पता नहीं है।”

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