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नफ़्स पर क़ाबू रखना इस्लाम का तुर्रा ए इमतियाज़ (खासियत)

अल्लाह तआला ने इंसानी फ़ित्रत में चंद तक़ाज़े रखे हैं, मसलन कुछ वक़्त गुज़रने के बाद इंसान को भूख महसूस होती है तो इंसान खाने का बंद-ओ-बस्त करता है, प्यास महसूस होती है तो पानी पीने का इंतेज़ाम करता है, जब काम करके थक जाता है तो नींद क

अल्लाह तआला ने इंसानी फ़ित्रत में चंद तक़ाज़े रखे हैं, मसलन कुछ वक़्त गुज़रने के बाद इंसान को भूख महसूस होती है तो इंसान खाने का बंद-ओ-बस्त करता है, प्यास महसूस होती है तो पानी पीने का इंतेज़ाम करता है, जब काम करके थक जाता है तो नींद की कैफ़ीयत महसूस करता है और सोने का एहतिमाम करता है। उसे जब पेशाब पाख़ाना की हाजत होती है तो बैत उल‍ खुला में जाकर फ़राग़त हासिल करता है।

ये सबके सब तिब्बी तक़ाज़े हैं, जिनको इंसान थोड़ी देर तो रोक सकता है, मगर उनको पूरा किए बगै़र आराम-ओ-सुकून नहीं पा सकता। इसी तरह इंसान जब बालिग़ हो जाता है तो वो अपने अंदर शहवत का जिन्सी तक़ाज़ा महसूस करता है, इस तक़ाज़ा को इंसान कुछ अर्सा के लिए तो ज़ब्त कर सकता है, मगर उनको पूरा किए बगै़र सुकून नहीं पा सकता।

{अल्लाह तआला ने मर्द-ओ-औरत के लिए निकाह को शहवत का ईलाज बताया है। इरशाद बारी ए तआला है कि औरतों में से जो तुम्हें पसंद हो उनसे निकाह करो (अल निसा‍ ३) यानी निकाह शहवत का बेहतरीन ईलाज है।

शहवत की हालत में तबीयत में अजीब तरह का इंतिशार-ओ-इज़तिराब होता है, ऐसी हालत में ना इबादत में दिल लगता है, ना तसल्ली बख़्श कोई काम होता है, दिल-ओ-दिमाग़ पर ऐसा नशा छा जाता है कि इसे पूरा किए बगै़र कोई चारा नहीं होता,जबकि मियां बीवी के मिलाप के बाद वो सारा नशा हरन हो जाता है, तबीयत में आसूदगी महसूस होती है, हर तरह का तनाव ख़त्म हो जाता है, इंसान अपने आप में इंशिराह महसूस करता है,इसीलिए मर्द-ओ-औरत एक दूसरे के लिए अतीया ख़ुदावंदी और तोहफ़ा आसमानी हैं।

इरशाद बारी तआला है और उनकी निशानीयों में से है कि पैदा किया है तुम्हारे नफ़्सों से तुम्हारे लिए जोड़े, ताकि तुम उनसे सुकून हासिल करो (सूरतुल रूम २१) इस आयत मुबारका से साबित हुआ कि मर्द-ओ-औरत एक दूसरे के लिए क़ुदरत की बेहतरीन निशानीयां हैं, इन्हें एक दूसरे से मिलकर सुकून नसीब होता है। दीन ए इस्लाम चूँकी दीन ए फ़ित्रत है, इसने रहबानीयत का हुक्म नहीं दिया, ना ही बौद्व मत की तरह सारी उम्र बगै़र शादी के गुज़ारने को पसंद किया है और ना ही शादी की मारफ़त के हुसूल में रुकावट पैदा किया है, बल्कि इरशाद बारी ए तआला है कि और अलबत्ता तहक़ीक़ हमने आपसे पहले भी रसूल भेजे और हमने इनके लिए बीवीयां और औलाद बनाई। (सूरा अर् राद।६)

हुज़ूर नबी अकरम स०अ०व० ने अपनी उम्मत को निकाह का हुक्म दिया और उसे निस्फ़ दीन बतलाया। मिशकात शरीफ़ में एक रिवायत नक़ल की गई है कि जिस बंदा ने शादी कर ली, इसने निस्फ़ दीन पूरा कर लिया। इफ़्फ़त-ओ-पाकदामनी की ज़िंदगी गुज़ारने के लिए शादी बेहतरीन ईलाज है।

हुज़ूर नबी अकरम स०अ०व० का इरशाद है कि जो शख़्स अल्लाह तआला से पाक साफ़ मिलना चाहे, उसको शरीफ़ औरतों से शादी करनी चाहीए (मिशकात) इससे मालूम हुआ कि शादी करने से ना सिर्फ़ शहवत से छुटकारा हासिल होता है, बल्कि बड़े बड़े गुनाहों से बचना भी आसान हो जाता है।

अस्बाब के ऐतबार से गुनाहों से मुकम्मल इजतिनाब के लिए शादी लाज़िमी है। ग़ैर शादीशुदा शख़्स मुजाहिदा करके अपने आपको जिन्सी गुनाह से बचा भी ले तो भी अपने दिल-ओ-दिमाग़ को जिन्सी ख़्यालात से नहीं बचा सकता, इसके लिए किसी वक़्त भी गुनाह में मुलव्वस होने का ख़तरा मौजूद रहता है।

शादी के बाद ये ख़तरा ख़त्म तो नहीं होता, अलबत्ता कम ज़रूर हो जाता है, यानी हलाल तरीक़े से शहवत पूरा करने की बिना पर हराम से बचना आसान हो जाता है। हाफ़िज़ इब्ने हजर ने फ़तह अलबारी में लिखा है कि शादी शहवत तोड़ने, नफ्श को अफ़ीफ़ बनाने और नसल ए इंसानी को बढ़ाने का ज़रीया है।

बाअज़ अहादीस से साबित होता है कि हुज़ूर नबी अलैहिस्सलाम ने बगै़र किसी उज़्र के शादी ना करने वालों से नाराज़गी का इज़हार फ़रमाया है।

बुख़ारी शरीफ़ की रिवायत है कि में शादी करता हूँ, पस जो मेरे तरीक़ा से इन्हिराफ़ करे वो मुझसे नहीं। मुझसे नहीं का मतलब ये है कि इसका मेरे साथ कोई ताल्लुक़ नहीं, वो मेरी उम्मत में से नहीं है। नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए इससे ज़्यादा सख़्त अंदाज़ और क्या हो सकता है?।

हज़रत अबूज़र रज़ी० से रिवायत है कि इकाफ़ बिन बशीर तमीमी एक दिन नबी अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुए। हुज़ूर स०अ०व० ने दरयाफ्त फ़रमाया ऐ इकाफ़! तुम्हारी बीवी है?। उन्होंने कहा नहीं। फिर पूछा क्या तुम्हारे पास बांदी है?। उन्होंने कहा नहीं। हुज़ूर नबी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि तुम ख़ुशहाल हो, शादी करने की सलाहीयत रखते हो, फिर भी शादी नहीं की, तब तो तुम शैतान के भाईयों में से हो (अन अहमद, किताब अन्न निकाह। जमा अल फ़वाइद) इस इबारत का मक़सूद-ओ-निशा एक आम तालिब-ए-इल्म भी आसानी से समझ सकता है।

शहवत का बेहतरीन ईलाज यही है कि मर्द अपनी बीवी से ताल्लुक़ रखे और ग़ैर महरम से बेतमा हो जाये। मशहूर है कि अगर घर में पेट भरकर दाल रोटी खालें तो बाहर हलवा, बिरयानी और मुर्ग़ मुसल्लम भी खाने को दिल नहीं चाहता। हुज़ूर नबी अकरम स०अ०व्० की एक हदीस ए पाक से ये भी मालूम होता है कि अगर किसी शख़्स की नज़र ग़ैर महरम पर पड़ जाये और इसका हुस्न-ओ-जमाल तबीयत को भा जाये तो आदमी को चाहीए कि घर पहुंच कर अपनी बीवी के साथ हमबिस्तरी करे।

इसलिए कि जो कुछ उस औरत के पास था, वो सब कुछ उसकी बीवी के पास मौजूद है। हुज़ूर स०अ०व० का इरशाद है कि बिलाशुबा औरत शैतान की सूरत में आती है और शैतान की सूरत में वापिस जाती है। जब तुम में से किसी को (कोई) औरत अच्छी लगे और दिल (उसकी तरफ़) माइल हो तो उसे चाहीए कि बीवी के साथ हमबिस्तरी करे, इस तरह असर ख़त्म हो जाएगा।

शरह मुस्लिम में अल्लामा नूवी इस हदीस ए शरीफ़ के तहत लिखते हैं कि किसी औरत को देखने से जब किसी की शहवत में उभार पैदा हो तो उसको चाहीए कि बीवी से हमबिस्तरी करे, ताकि दिल का तक़ाज़ा ठंडा पड़ जाये और नफ्स को सुकून मिले और दिल जिस बात के दरपे है, वो जाती रहे।

मुंदरजा बाला रवायात से मालूम हुआ कि जायज़ तरीक़े से शहवत पूरा करने के बाद नाजायज़ तरीक़ों से बचाओ आसान हो जाता है। लिहाज़ा मर्द को चाहीए कि अपनी बीवी को अल्लाह तआला की नेअमत समझे, उसकी क़दर करे और हर मुम्किन उसे ख़ुश रखने की कोशिश करे।

इसी तरह बीवी को चाहीए कि अपने ख़ावंद को अल्लाह तआला की अता समझे, उसको सच्चे दिल से चाहे, उसकी ख़िदमत में कोताही ना करे, उसे कलबी सुकून पहुंचाने की हरमुम्किन कोशिश करे, इस तरह मियां बीवी दोनों को अल्लाह तआला की रज़ा नसीब होगी। एक हदीस ए शरीफ़ में है कि जब बीवी ख़ावंद को देख कर मुस्कुराती है या ख़ावंद बीवी को देख कर मुस्कुराता है तो अल्लाह तआला इन दोनों को देख कर मुस्कुराता है। (मौलाना ज़ुल्फ़क़ार अहमद नक़्शबंदी)

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