नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की दुआएं

नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की दुआएं
(मौलाना मोहम्मद मजहर उल हुदा कादरी) नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जात दो कमालात की जामे है- एक अब्दियत दूसरी नबुवत। अब्दियत भी कामिल अब्दियत जिसका मजहर और नतीजा है और नबुवत जामिया का जहूर दावत है। दावत से सीरत के पन्ने भरे ह

(मौलाना मोहम्मद मजहर उल हुदा कादरी) नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जात दो कमालात की जामे है- एक अब्दियत दूसरी नबुवत। अब्दियत भी कामिल अब्दियत जिसका मजहर और नतीजा है और नबुवत जामिया का जहूर दावत है। दावत से सीरत के पन्ने भरे हैं और पूरी दुनिया में इसके आसार व नतीजे दरखशां व ताबां है।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की दावती जिंदगी खुली किताब की तरह है। इसलिए सब पर अयां है लेकिन नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जिंदगी में दुआ को जो मकाम हासिल है जो अब्दियत कामिला का मुकम्मल जहूर है, बहुत कम लोगों को इस हकीकत पर नजर गई और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की दावती जिंदगी की तासीर व तसखीर में इसका कितना हिस्सा है और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अब्दियत के इस शोबे को उरूज व तरक्की की किस मकाम तक पहुंचाया और किस तरह आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस शोबे का एहया फरमाया और इसको नई जिंदगी बख्शी और नए सिरे से इसकी तजदीद फरमाई जो बंदगी के तमाम शोबों और मजाहिर की तरह मुर्दा व अफसुर्दा हो चुका था और जहां पजमुर्दगी छा गई थी।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इसकी तकमील फरमाई और तामीम फरमा कर दुनिया को खुदा से करीब तर कर दिया।

दौरे जाहिलियत में खालिक और मखलूक के बीच जो रिश्ता होना चाहिए इस ताल्लुक में इस कदर इजमहलाल पैदा हो गया था कि दुआ का सरचश्मा, जो यकीन और मोहब्बत व खौफ के बगैर जारी नहीं हो सकता, खुश्क हो गया था, मालिक और आका के मुताल्लिक अपनी गलतफहमियां और जिहालतों का शिकार था कि उसके अन्दर दुआ का जज्बा व तकाजा ही मफकूद हो चुका था, दुआ के लिए उस जिंदा जावेद हस्ती के यकीन की जरूरत है, जिससे दुआ की जाए फिर उस पर यकीन की कि तमाम कुदरत उसी को हासिल है, वही सब कुछ देने वाला है।

फिर इस यकीन की कि उसके दर के सिवा कोई दर नहीं और फिर यह यकीन भी हो कि वह मालिक ऐसा है जो देना चाहता है। उसकी खास सिफतों में रहमत व मोहब्बत, अता व बख्शिश, इनाम व एहसान भी है। उसकी खुशी की इंतिहा उस वक्त होती है जब वह किसी को देता है फिर यह यकीन भी पैदा हो कि मखलूक मोहताज महज है और सर से पांव तक भिकारी है और यह यकीन भी हो कि वह माबूद बरहक अपनी हर मखलूक के और दुनिया की हर चीज से इतना करीब है वह हर एक की सदा सुनता है और हर हाल में हर एक की मदद भी करता है।

जमाना जाहिलियत में हर यकीन कितना नायाब और मजमहल हो चुका था और इन सारी हकीकतों में कितने शुब्हात और पर्दे पड़ चुके थे और कितनी गलतफहमियां पैदा हो चुकी थी लोग तौहुम के शिकार हो चुके थे, अल्लाह की जात के वाजिब अलवजूद का इंकार और सिफात की नफी और मुजर्रिद व बला सिफते जात के असबात पर यूनानी फलसफे को जितना इसरार था उसके बाद दुआ व इल्तिजा का क्या इमकान बाकी रह सकता है।

जिस जात के मुताल्लिक कोई इल्म नहीं बल्कि उससे हर सिफते कमाल की नफी जारी हो उसके दस्त सवाल दराज करने और इस्तिआनत और मदद चाहना क्या मायनी रखता है। जिसे कारखाना-ए-कुदरत से बेदखल और जो अक्ल अव्वल को पैदा करके मुअत्तल हो गया।

जिस वाहिद से एक ही वाहिद का सुदूर हो सकता है और वह हो चुका । उससे हर दम और हर घड़ी नए नए अफआल व एहकाम कब सादिर हो सकते हैं।

दूसरी तरफ मुशरिकाना अकायद ने सिफाते इलाहिया में से तकरीबन हर सिफत को किसी न किसी मखलूक से जोड़े रखा था। कोई कोई जिंदगी का मालिक था। कोई मौत का मालिक था, कोई रिज्क फराहम करने वाला बन बैठा था, किसी का इल्म मुहीत व हमागीर था, हर गैब उसके लिए शहूद था।

किसी के लिए जबान व मकान के हिजाबात उठ चुके थे और वह अपने पैरोकारों की हर जगह और हर वक्त मदद कर सकता था और हर जगह उसकी पहुंच थी। ऐसेे हालात में और बिगड़े हुए माहौल में एक अल्लाह की तरफ रूजूअ करने और उससे दस्ते सवाल दराज करने का क्या इमकान था? और ऐसे हालात में जबकि वह नजर से ओझल हो और मकामी माबूद नजर के सामने और उनके दस्तरस के अन्दर हों और इसके साथ यह भी कि जमाना जाहिलियत में अल्लाह वाहिद की सिफात व अफआल का तजकिरा भी मफकूद और इल्म सही मादूम और शिर्क जदा माहौल में उनकी मजलिसे माबूदाने बातिल की कारफरमाइयों और कारसाजियों की दास्तानों से मामूर थे और उनकी जेहनी कैफियत बिल्कुल कुदरती और तबई थी जिसका नक्शा कुरआन मजीद ने खींचा है-

‘‘और जब अल्लाह का जिक्र किया जाता है तो जो लोग आखिरत पर यकीन नहीं रखते उनके दिल नफरत करते हैं और इसके सिवा जब औरों का जिक्र किया जाता है तो फौरन खुश हो जाते हैं।’’ (अलजमर-45)

यूनानी फलसफे ने जो मसलक अख्तियार किया उसकी बिना पर दुआ व इल्तिजा का दरवाजा ही बंद कर दिया था और दूसरी तरफ मुशरिकाना जाहिलियत ने इस तर्जे अबूदियत का रूख खालिक से मोड़कर बंदो की तरफ कर दिया था और सिफाते इलाही को मखलूक की तरफ मंसूब करके सीधे खुदा से तलब व सवाल और दुआ व इल्तिजा का रिवाज ही तकरीबन खत्म हो गया था।

ऐसे चंद आदमी भी मिलने मुश्किल थे जिन को खुदा से दुआ करने की आदत और इसका सलीका हो।
नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ऐसे वक्त और ऐसे पुर आशूब माहौल में तशरीफ लाए जिन्होंने महरूम व महजूब इंसानियत को दोबारा दुआ की दौलत से नवाजा, दर-दर की ठोकरे खाने वाला यह इंसान जिसे दुआ की दौलत अता फरमाई और मुख्तलिफ दरबारों और बारगाहों की खाक छानने वाले बंदो को खुदा से हमकलामी का शरफ मिला और बंदगी की लज्जत से आशना कर दिया और बाइज्जत जिंदगी अता फरमाई और उस महरूम इंसानियत को फिर से अजन बारयाबी की दौलत मिली और अपने खालिक व मालिक के आस्ताने की तरफ वापस हुआ।

जाहिलियत का एक गलत तखय्युल यह था जिसकी वजह से बंदा अपने खुदा से दुआ से महरूम था कि खुदा हमसे बहुत दूर है, हम खुदा तक कैसे पहुंच सकते हैं। अल्लाह तआला ने अपने रसूल के जरिए यह एलान फरमाया और यह लाफानी पैगाम दिया -‘‘ और जब आपसे मेरे बंदे मेरे मुताल्लिक सवाल करें तो मैं नजदीक हूं, दुआ करने वालों की दुआ कुबूल करता हूं।’’ (बकरा-186)

जाहिलियत का एक गलत अकीदा यह था कि गैरूल्लाह भी नफा व नुक्सान का मालिक और इमदाद व अयानत पर कादिर है। इस गलत अकीदे ने हकीकी नाफे से हटाकर गैर की तरफ मुतवज्जो कर दिया था कि वह भी मआविन है।

इन गलत अकायद व तौहुमात के जरिए पूरी दुनिया शिर्क और बुतपरस्ती के दलदल में फंसी हुई थी। कुरआने करीम ने इसका नक्शा निहायत बलीग अंदाज से खींचा है और पूरी वजाहत के साथ इस फरमान का एलान किया-‘‘कह दो, ऐ लोग! अगर तुम्हें मेरे दीन में शक है तो अल्लाह के सिवा जिनकी तुम इबादत करते हो मैं उनकी इबादत नहीं करता बल्कि मैं अल्लाह की इबादत करता हूं और यह भी कि यकसू होकर दीन की तरफ रूख किए रखो और मुशरिकों में न हो और अल्लाह के सिवा ऐसी चीज को न पुकारों जो न तेरा भला करे और न बुरा।

और अगर फिर तूने ऐसा किया तो बेशक जालिमों में से हो जाएगा और अगर अल्लाह तुम्हें तकलीफ पहुंचाए तो उसके सिवा उसको कोई हटाने वाला नहीं और अगर तुम्हें कोई भलाई पहुंचाता है तो कोई उसके फजल को फेरने वाला नहीं। अपने बंदो में जिसे चाहता है अपना फजल पहुंचाता है और वही बख्शने वाला मेहरबान है। (यूनुस-104.107)

सिर्फ इसी वजाहत पर आप ने इक्तफा नहीं किया कि बंदा अपने मालिक से दुआ कर सकता है और वह उसकी सुनता है और उसकी मदद कर सकता है बल्कि आपने इसकी भी वजाहत की कि अल्लाह को दुआ मतलूब है और वह उससे खुश और राजी होता है और अदम दुआ से नाराज होता है।

दुआ एक अजीम नेमत और अनमोल तोहफा है। कोई भी इंसान किसी भी हाल में दुआ से मुस्तगनी नहीं हो सकता। दुआ अल्लाह की इबादत है और उसके दरबार में सबसे बाइज्जत तोहफा है। दुआ बंदगी का निहायत वाजेह और असरदार मुजाहिरा है और दुआ से गुरेज अश्कबार और सरकशी की अलामत है।

दुआ से बढ़कर अल्लाह के यहां कोई चीज बाइज्जत नहीं। अल्लाह से उसका फजल मांगो क्योंकि वह अपने से मांगने को पसंद करता है। (तिरमिजी, इब्ने माजा)। दुआ मोमिन का हथियार है, रूह की तस्कीन है, कल्ब की तमानियत है। दुआ से अल्लाह तआला के गुस्से की आग ठंडी हो जाती है।

दुआ अल्लाह की जात पर भरोसा की गाइड लाइन है, दुआ आफत व मुसीबत की रोकथाम का मजबूत वसीला है और अपनी असरअंगेजी और तासीर के लिहाज से एक हकीकत है। दुआ का इंसानी जिंदगी से गहरा ताल्लुक है और फिर इस एलान से दुआ का मकाम कहीं से कहीं पहुंचा दिया और इसको आला
इबादत करार दिया और मकामे कुर्ब तक उसकी रसाई हो गई। ‘‘और तुम्हारे रब ने फरमाया है कि मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी दुआएं कुबूल करूंगा।’’

——————बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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