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नमाज़ों की पाबंदी करो

पाबंदी करो सब नमाज़ों की और (ख़ुसूसन) दरमयानी नमाज़ की और खड़े रहा करो अल्लाह के लिए आजिज़ी करते हुए। (सूरत अलबक़रा।२३८)

पाबंदी करो सब नमाज़ों की और (ख़ुसूसन) दरमयानी नमाज़ की और खड़े रहा करो अल्लाह के लिए आजिज़ी करते हुए। (सूरत अलबक़रा।२३८)

ज़िक्र इलहि इस्लाम की रूह है। यही वो क़ुव्वत है, जिस से इंसान बखु़शी शरीयत के तमाम क़वानीन पर अमल करसकता है, इस लिए क़ुरआन का ये उस्लूब है कि जहां क़वानीन-ओ-अहकाम बयान हुआ, वहां साथ ही ज़िक्र इलहि की तरफ़ दिलों को राग़िब कर दिया, ताकि वो इन अहकाम की पाबंदी आसानी से करसकें।

नमाज़ ही ज़िक्र इलहि का सब से आला और बेहतर तरीक़ा है, इस में जिस्म-ओ-रूह, दिल-ओ-दिमाग़ सब मसरूफ़ इबादत-ओ-मुनाजात होते हैं। यहां भी मक़सद यही बताना है कि बार बार हमेशा नमाज़ अदा करते रहो, ये नहीं कि एक बार नमाज़ अदा करूं और हफ़्ता भर के लिए छुट्टी मिल गई।

इस्लाम में नमाज़ को जो एहमीयत हासिल है, वो मुहताज बयान नहीं। क़ुरआन-ए-क्रीम में इस का हुक्म सौ दफ़ा के क़रीब है। हुज़ूर (स०) ने इसे दीन का सतून फ़रमाया है और हम मुसलमान होकर नमाज़ के मुआमले में जितनी सुस्ती करते हैं, उसकी कोई हद नहीं।

यहां हुज़ूर (स०) का एक इरशाद नक़ल किया जा रहा है, मुम्किन है कि इस से कोई ख़ुशनसीब हिदायत पा जाये। हुज़ूर (स०) ने फ़रमाया जो नमाज़ पाबंदी से अदा करेगा, क़ियामत के दिन ये इस के लिए नूर होगी, इस के ईमान की वाज़िह दलील होगी और उस की नजात का बाइस होगी और जिस ने नमाज़ की पाबंदी ना की तो इस के पास ना नूर होगा, ना अपने ईमान की कोई दलील और ना बख़शिश का कोई वसीला और इस का हश्र क़ारून, फ़िरऔन, हामान और अबी बिन ख़लफ़ के साथ होगा।

अल्लाह ताआला हम सब को ग़फ़लत की नींद से बेदार करदे, अपनी इबादत और अपने महबूब की इताअत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। (आमीन)

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